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अपडेट करने की तारीख: 5 जून 2020

विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विकास की विसंगतियां हमारे सामान्य वैश्विक पर्यावरण के लिये कई गंभीर समस्या बन गयी हैं। परिणामस्वरूप हम पर्यावरण के जटिल मुद्दे जैसे ग्रीन हाउस प्रभाव (हरित ग्रह प्रभाव), ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक ऊष्मण), जैव विविधता के नुकसान, ओजोन परत की कमी तथा अम्ल वर्षा आदि का सामना कर रहे हैं। प्रकृति और पर्यावरण के नैसर्गिक स्वरूप एवं पारिस्थितिकीय को बनाए रखने में मनुष्य की ओर से दिखाई गई उदासीनता के दुष्परिणाम अकाल, बाढ़, भूकम्प, भूस्खलन जैसी आपदाओं के रूप में हमारे सामने आ रहे हैं। 26 दिसंबर, 2004 को समुद्र के भीतर उठी सुनामी और जून 2013 में केदारनाथ त्रासदी से जाहिर हो गया है कि कैसे विकास की विसंगतियां प्राकृतिक आपदा के रूप में आफत बनकर सामने आ सकती है।


पर्यावरण की इन चुनौतियों से निपटने और इसके प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए प्रत्येक वर्ष पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह एक संयोग ही है कि इस बार विश्व पर्यावरण दिवस ऐसे समय में मनाया जा रहा है, जब पहली बार हम पृथ्वी को काफी हद तक साफ-सुथरी और प्रदूषण रहित देख पा रहे हैं। देश के प्रमुख तीर्थ स्थल हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा जल एकदम साफ नीला दिखता है और वैज्ञनिक इसे पीने योग्य बता रहे हैं। हालांकि इसका एकमात्र कारण कोरोना संकट के कारण चल रहा लॉकडाउन है। कोरोना संकट ने पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण को लेकर सोचने का एक ऐसा अवसर प्रदान किया है, जहां दुनियाभर के तमाम देश एकजुट होकर अब समय-समय पर लॉकडाउन या ऐसी ही कुछ अन्य ऐसी योजनाओं पर विचार सकते हें, जिनसे पर्यावरण संरक्षण में अपेक्षित मदद मिल सके।


हमारे पुरातन वैज्ञानिकों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी। उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंधों को इस तरह स्थापित किया जिससे मानव द्वारा प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके। हमारे शास्त्र किसी भी उद्देश्य को ध्यान में रखकर क्यों न रचे गये हों, एक बात स्पष्ट है कि आज वैदिक चिंतन खास तौर पर पर्यावरण संरक्षण के लिये एक नयी दिशा तथा प्रदूषण से उत्पन्न चुनौतियों को जड़ से समाप्त करने में सक्षम है।


कल्याणकारी संकल्पना, शुद्ध आचरण, निर्मल वाणी एवं सुनिश्चित गति क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की मूल विशेषताएँ मानी जाती हैं और पर्यावरण-सन्तुलन भी मुख्यतः इन्हीं गुणों पर समाश्रित है। यजुर्वेद में भूमि प्रदूषण पर नियंत्रण हेतु उल्लेख है कि- “पृथिवी मातर्मा मा हिंसीर्मो अहं त्वाम” अर्थात् हे माता! तुम हमारा पालन पोषण उत्तम रीति से करती हो। हम कभी भी तुम्हारी हिंसा (दुरुपयोग) न करें। रासायनिकों व कीट नाशकों के अति प्रयोग से तुम्हारा कुपोषण न करें बल्कि फसल हेर-फेरकर बोने तथा गोबर, जल आदि से तुम्हें पोषित करें। अथर्ववेद में भी पृथ्वी को माता के रूप में पूजने की बात कही गई है। अथर्ववेद के अनुसार- ‘‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः”। ऋग्वेद में समग्र पृथ्वी की स्वच्छता पर बल देते हुए कहा गया है- ‘‘पृथ्वीः पूः च उर्वी भव:’’ अर्थात समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहे। यजुर्वेद में समूचे पर्यावरण को शान्तिमय बनाने की स्तुति है। इस मंत्र में द्युलोक, अंतरिक्ष और पृथ्वी से शान्ति की भावप्रवण प्रार्थना है। ‘‘ॐ द्यौ शांतिरन्तरिक्ष: शांति: पृथ्वी शांतिराप: शान्ति: रोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिब्रह्म शान्ति: सर्वं: शान्ति: शान्र्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॐ।।“ अर्थात जल शान्ति दे, औषधियां-वनस्पतियां शान्ति दें, प्रकृति की शक्तियां - विश्वदेव, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शान्ति दे। सब तरफ शान्ति हो, शान्ति भी हमें शान्ति दें।


ऐतेरेयोपनिषत् के अनुसार ब्रह्मांड का निर्माण पाँच तत्वों पृथ्वी, वायु, आकाश, जल एवं अग्नि को मिलाकर हुआ है – “इमानि पंचमहाभूतानि पृथिवीं, वायुः, आकाशः, आपज्योतिषि।“ (3:3)। इन्हीं पाँच तत्वों के संतुलन का ध्यान वेदों मै रखा गया है। इन तत्वों में किसी भी प्रकार के असंतुलन का परिणाम ही सूनामी, ग्लोबल वार्मिंग, भूस्खल, भूकम्प आदि प्राकृतिक आपदायें हैं। समुद्र मंथन से वृक्ष जाति के प्रतिनिधि के रूप में कल्पवृक्ष का निकलना, देवताओं द्वारा उसे अपने संरक्षण में लेना, इसी तरह कामधेनु और ऐरावत हाथी का संरक्षण इसके उदाहरण हैं। कृष्ण की गोवर्धन पर्वत की पूजा की शुरुआत का लौकिक पक्ष यही है कि जन सामान्य मिट्टी , पर्वत, वृक्ष एवं वनस्पति का आदर करना सीखें। हमारे शास्त्रों में पेड़, पौधों, पुष्पों, पहाड़, झरने, पशु-पक्षियों, जंगली-जानवरों, नदियाँ, सरोवन, वन, मिट्टी, घाटियों यहाँ तक कि पत्थर भी पूज्य हैं और उनके प्रति स्नेह तथा सम्मान की बात बतलायी गयी है। गेहूँ, जौ, तिल, चना, चन्दन, लाल पुष्प, केसर, खस, कमल, ताम्बूल, श्वेतपुष्प, बांस, मिट्टी, फल, तुलसी, हल्दी, पीत-पुष्प, शहद इलाइची, सौंफ, उड़द, काले-पुष्प, सरसों के फूल, मुलेठी देवदारू, बिल्व वृक्ष की छाल, आम, पला, खैर, पीपल, गूलर, दूब, कुश आदि को संरक्षित रखने के उद्देश्य से इन्हें किसी दिन, त्योहार, देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना से जोड़ा गया है। औषधि के रूप में फलों तथा जड़ी-बूटियों की रक्षा करने की बात कही गयी है और इन्हें घरों के निकटस्थ लगाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखने की सलाह दी गयी है। जितने भी त्योहार हैं, वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। मकर संक्रान्ति, वसन्त पञ्चमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, वटसावित्री, ओणम, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देवप्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा, आदि सब पर्व प्रकृति-संरक्षण का पुण्य स्मरण है। बुद्धिजीवियों का यह चिन्तन पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिये सार्थक तथा संरक्षण के लिये बहुमूल्य हैं।


वन्य जीव जन्तु भी हमारे पर्यावरण के प्रमुख अंग माने जाते हैं। इनका सही सन्तुलन होने पर पर्यावरण शुद्ध तथा स्वच्छ रहता है। इनकी सुरक्षा के लिए वन्य जीवों को पूज्य मानकर इनकी पूजा का भी प्रावधान हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं में रखा गया है। विशेषतः गणेश, हनुमान और नागपूजा की व्यवस्था की गई हैं ताकि लोगों में पशु प्राणियों के लिए आस्था अक्षुण्य बनी रहे। गायों की महत्ता को प्रकट करने हेतु गोपाष्टमी, बछबारस का त्योंहार मनाया जाता हैं। गाय किसानों की जीवन धारा है। कृषि भूमि में उत्पादन को हानि पहुंचाने वाले चूहों पर नियन्त्रण रखने वालें सांपों के प्रति श्रद्धा सूचक नाग पंचमी व गोगानवमी का त्यौंहार मनाया जाने लगा। मरे हुए जानवरों की गंदगी को दूर करने वाले कौओं के प्रति श्रद्धा स्वरूप श्राद्व पक्ष में उनको भोजन खिलाने की परम्परा है। भोजन से पहले एक रोटी अथवा पाँच ग्रास चींटी, कौए, कुत्ते आदि के लिए निकालकर उन्हे जीवित रखने की व्यवस्था प्रकट की गई है।


हमारे पूर्वजों ने किसी संस्था से शिक्षा प्राप्त नहीं की, लेकिन अपनी रचनाओं में प्रकृति को इस तरह चित्रित किया कि इसके विनाश की बात सोची भी नहीं जा सकती। धार्मिक ग्रन्थों, उपनिषदों में वन, नदी, जीव-जन्तु, पशु-पक्षियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी। वाल्मीकि जी लिखते हैं कि श्री भरत जी अपने सेना एवं बाकी लोगों को छोड़कर मुनि के आश्रम में इसलिये अकेले जाते हैं कि आस-पास के पर्यावरण को कोई क्षति न पहुँचे-"ते वृक्षानुदकं भूमिमाश्रमेषूटजांस्तथा। न हिंस्युरिति तेवाहमेक एवागतस्ततः।।" अथार्त वे आश्रम के वृक्ष, जल, भूमि और पर्णशालाओं को हानि न पहुँचायें, इसलिये मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ। पर्यावरण की संवेदनशीलता का यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है। कालिदास जी ने पर्यावरण संरक्षण के विचार को मेघदूत तथा अभिज्ञान शाकुन्तलम में दर्शाया। हमारी प्राचीन संस्कृति तो 'अरण्य-संस्कृति' या 'तपोवन-संस्कृति' के नाम से ही जानी जाती रही है, पर आज के विकासवाद से उसका रूप प्राय: अस्तित्वविहीन-सा हो रहा है। विचार करें तो समझ में आयेगा कि पर्वतराज हिमालय से लेकर कन्या कुमारी तक जो तीर्थों की शृंखला सी बनी हुई है उनकी यात्रा से हमें विभिन्न जगहों की भौगोलिकता, पर्यावरण का ज्ञान, लोगों के रहन-सहन जीवनचर्या और जीवन-यापन करने के तौर-तरीकों का बोध होता है और अनेकता में एकता का आभास मिलता है।


हमारे पुरातन वैज्ञानिकों द्वारा लिखे गये वेद केवल धर्म एवं आस्था का विषय न होकर एक विज्ञान भी है। पृथ्वी एवं अन्तरिक्ष के कण-कण की पूजा जहाँ एक ओर परमात्मा की सर्वव्यापकता के दृष्टान्त को प्रतिपादित करती है, वहीं दूसरी ओर स्वस्थ पर्यावरण की कल्पना को भी मूर्त रूप देती है। पर्यावरण का स्वच्छ एवं सन्तुलित होना मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। आज जरूरत है प्राचीन ग्रंथों के वैज्ञानिक तथ्यों को आसान तरीके से लोगों के सामने रखने और उनके आधार पर विज्ञानपरक शोध की, जिसके माध्यम से कृषि, पर्यावरण आदि सहित अन्य क्षेत्रों में नया आयाम दिया जा सके। हम चाहें तो प्राचीन ग्रंथों में निर्दिष्ट मंत्रों से आयुर्वेद, तकनीकी, मौसम आदि विषयों का वैज्ञानिक रहस्य उजागर कर सकते हैं। यह जरूरी हो गया है कि हमारे पुरातन वैज्ञानिकों द्वारा प्रदत विश्व कल्याणकारी वैदिक चिंतन को ध्यान में रखते हुए जीवन पद्धति को इस प्रकार व्यवस्थित बनाया जाए कि मानव और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम रह सके। हमारे द्वारा विकास की प्रक्रिया को इस प्रकार निर्धारित किया जाए कि उससे प्राकृतिक संसाधनों पर विपरीत प्रभाव न हो।


मैं सभी शिक्षकों से निवेदन करना चाहता हूँ कि क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि हम पर्यावरण संरक्षण हेतु देश की युवा शक्ति के योगदान को सुनिश्चित करने हेतु अपने मार्गदर्शन एवं शिक्षा के माध्यम से देश के कर्णधारो में पर्यावरणीय मूल्यों की स्थापना करें। कोरोना वायरस की महामारी ने स्पष्ट कर दिया है कि मुश्किल घड़ी में हम किस तरह कोरोना वारियर्स बनकर एक दूसरे का साथ देने के लिए तैयार खड़े हैं। तो क्या यही जोश और इच्छा शक्ति हम जीवन पर्यन्त पर्यावरण के सजग प्रहरी बनने में ज़ाहिर नहीं कर सकते?


हमने भूमि को माता माना है इसलिए इस भाव से विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रकृति के नियमों तथा संसाधनों की रक्षा को अपना प्रधान ‘धर्म’ मानते हुए संकल्प लें कि वृक्षारोपण कर अपनी धरती को रहने लायक बनाएंगे। नहीं तो एक समय ऐसा भी आ सकता है जब हम अपनी गलतियों को सुधारने के लिए प्रतिबद्ध दिखेंगे तब तक प्रकृति अपना विकराल रूप दिखा जाएगी।

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