कोरोना संक्रमण : प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का अवसर

कोविद-19 संकट चुनौतीपूर्ण समय सामाजिक बंधन और लोगों को जोड़ने और उनकी मदद करने के अन्य तरीकों के लिए एक शानदार अवसर प्रदान करता है। मुसीबत के इस समय में "हम एक साथ हैं" की भावना हमें अपने सामाजिक पक्ष को फिर से जोड़ने और अधिक सामाजिक सामंजस्य बनाने का मौका देता है

संपूर्ण विश्व में कोरोनावायरस महामारी की वजह से सामाजिक स्वास्थ्य के लिए आपात काल एवं अनिश्चितता का वातावरण बना है। दुनिया के लगभग 210 देशों में कोरोनावायरस (कोविड-19)संक्रमण की वजह से मानव जीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त एवं प्रभावित हुआ है। पूरा विश्व कोरोना के दुष्चक्र से निकलने के लिए असाधारण कदमों और उपायों की जरूरत मह्सूस कर रहा है। दुर्भाग्य से विश्व की एक तिहाई से अधिक लोग लॉकडाउन की वजह से अपने घरों पर बैठने में मजबूर हैं। त्रासदी का आलम यह है किबड़े एवं अत्याधुनिक अस्पतालों तथा उत्कृष्ट सामाजिक सुरक्षा वाले हमारे समृद्धतम राष्ट्र आज कोविड-19 की पीड़ा से सबसे ज्यादा मजबूर एवं परास्त दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका, इटली, स्पेन, जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम और चीन जैसे शक्तिशाली देश भी इस संक्रमण के समक्ष लाचार दिखाई दे रहे हैं।


कोविद-19 संकट चुनौतीपूर्ण समय सामाजिक बंधन और लोगों को जोड़ने और उनकी मदद करने के अन्य तरीकों के लिए एक शानदार अवसर प्रदान करता है। मुसीबत के इस समय में "हम एक साथ हैं" की भावना हमें अपने सामाजिक पक्ष को फिर से जोड़ने और अधिक सामाजिक सामंजस्य बनाने का मौका देता है


अगर हम अजर-अमर भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों पर दृष्टिपात करें तो हम पाएंगे भारतीय जीवन शैली और सांस्कृतिक प्रथाएं प्रकृति की रक्षा के विज्ञान पर आधारित हैं और ग्लोबल वार्मिंग जैसे पर्यावरणीय मुद्दों को हल करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारतीय दर्शन, जीवन शैली, परंपराएं और सांस्कृतिक प्रथाएं प्रकृति की रक्षा के ज्ञान पर आधारित हैं। हम सबको संकट की इस घडी में "हम एक साथ हैं" की भावना से सामाजिक सहयोग की नई इबारत लिखनी है


अगर हम सबको अपने अस्तित्व को बचाए रखना है तो अपने परंपरागत मूल्यों को जीवन में अपनाकर प्रकृति के साथ पूर्ण समन्वय बनाना होगातेजी से बदलते हुए वैश्विक परिवेश में यह उत्साहजनक है कि आज संपूर्ण मानवता इस बात को मानने लगी है कि भारतीय जीवन शैली और सांस्कृतिक प्रथाएं प्रकृति की रक्षा के विज्ञान पर आधारित हैं। हमारी जीवन शैली, सांस्कृतिक परंपराएं विज्ञान की हर कसौटी पर खरी उतरती है अगर हम अपने रीति-रिवाजों, अपनी मान्यताओं पर गहनता से विचार करें तो पाएंगे कि हमारे दूर-दृष्टा ऋषि-मुनियों की सोच पूरी तरह से वैज्ञानिक और नवाचार युक्त थीमौसम परिवर्तन जैसे जटिल पर्यावरणीय मुद्दों को हल करने के लिए हमारी सोच अत्यंत व्यावहारिक और कारगर हैं।


यजुर्वेद में ‘द्यौ शांतिरंतरिक्षं...’ (शुक्ल यजुर्वेद, 36/17)

शांतिपाठ के माध्यम से हमारे ऋषि सर्वशक्तिमान से समस्त पृथ्वी, वनस्पति, परब्रह्म सत्ता, संपूर्ण ब्रहांड, कण-कण में शांति की प्रार्थना करते हैं। इतिहास साक्षी है कि हज़ारो साल पूर्व वैदिक काल से आज तक, मुनियों, चिंतकों और मनीषियों द्वारा विभिन्न माध्यमों से पर्यावरण के सरंक्षण संवर्धन हेतु अपनी चिंता को अभिव्यक्त किया गया। इन लोगो द्वारा मानव जाति को पर्यावरण के प्रति सचेत करने का प्रयत्न किया जाता रहा है। वैदिक ऋषियों ने लोगों को प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर समग्र तरीके से पर्यावरण और इसके प्रत्येक घटकों के महत्व को प्रतिपादित तो किया ही है, साथ ही मनुष्य के जीवन में उनके पर्यावरणीय महत्व को भी भली-भांति स्वीकार किया है।


स्वच्छ वातावरण के महत्ता को आज भी हम यह महसूस कर सकते हैं। पर्यावरण पर लॉकडाउन का असर साफ़ दिखने लगा है वर्षो बाद अब साफ़ नीला आसमान दिखने लगा है साथ ही वर्षो पहले खो चुका पक्षियों के मधुर स्वर का कलरव अब अनायास ही दोबारा सुनाई देने लगा है। आज पूरा विश्व समुदाय पूरी शिद्दत से महसूस करता है कि (सामान्य परिस्थितियों में) हम सबको एक स्थिर संतुलन बनाए रखने के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए।हमें केवल उतना ही संसाधुनो का उपभोग करना चाहिए जितना हमारे लिए आवश्यक हो। वैज्ञानिक भी इस बात का समर्थन करते हैं कि माँ वसुधा हम सबकी भूख अन्य आवश्यकता तृप्त करने में सक्षम है। हमे संसाधनों का विवेकपूर्ण दोहन करना चाहिए, उपनिषदों में भी कहा गया है

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्


दुर्भाग्य से हमने भौतिकवाद की चकाचौंध में अपने क्षुद्र स्वार्थो के लिए संसाधनो का अंधाधुंध शोषण किया हैं। फिर सतत विकास लक्ष्यों के प्राप्ति का रास्ता भी तो यहीं से होकर गुजरता है। प्रकृति का सरंक्षण ही हमें जीवन प्रदत करता है। वस्तुत: देखा जाए तो प्रकृति के अनुरूप प्रवृति ही संस्कृति है। प्रकृति के विपरीत प्रवृति विकृति को जन्म देती है। संस्कृति जहाँ सृजनात्मक है जबकि विकृति विध्वंस करती है। यह विध्वंस चाहे, हमारे प्राकृतिक संसाधनों (जल, जमीन, जंगल) का हो हमारे सदविचारो का, मानवीय संवेदनाओं का या फिर हमारे शाश्वत मूल्यों का हो। इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि मेरा जन्म हिमालय में हुआ। वह हिमालय जो भारत की संस्कृति, भारत की अस्मिता का गौरव स्तम्भ है। माँ भारती को महिमान्वित करने वाला कोई भी आयाम हो -भौगोलिक, प्राकृतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक या नैतिक, ये सब हिमालय से प्रेरित होते है। अद्भुत नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह हिमालय जहाँ एशिया का वाटर टावर है, वहीँ अध्यात्म और योग की पहली पाठशाला है। भारत की संस्कृति का प्राण हिमालय असीम प्राकृतिक संसाधनों का भण्डार है। गंगा-यमुना सहित इसकी अमृतमयी जलधाराएं नवजीवन का संचार करती है।


मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि वर्ष 2009 में समस्त जलधाराओं के सरंक्षण संवर्धन हेतु गंगोत्री से “स्पर्श गंगा अभियान” की शुरुआत की गयी जो आज जल-सरंक्षण की दिशा में एक सफल अंतराष्ट्रीय अभियान बन चुका है। वर्ष 2010 में शिमला, हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री सम्मलेन के दौरान मैंने मौसम परिवर्तन के चलते हिमनदों पर विनाशकारी प्रभाव को रोकने हेतु हिमनद प्राधिकरण की स्थापना करने का प्रस्ताव किया। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में जैव विविधता और अन्य वन सम्पदा के सरंक्षण के लिए उत्तराखंड में वन पंचायतों का 6 हज़ार से साढे 12 हज़ार तक विस्तार कर इस महत्वपूर्ण कार्य में जान सहभागिता को बढ़ाने की अभूतपूर्व पहल की गयी जिसके अत्यंत सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। हिमालयी राज्यों द्वारा वन सरंक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हेतु ग्रीन बोनस की जो संकल्पना की गयी थी वह आज यथार्थ बन चुका है।


मानव गतिविधियो और प्रकृति पर उसके प्रभाव  का विश्लेषण किया जाए तो यह निश्चित है कि हमें प्रकृति के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। इस बात में जरा भी संदेह नहीं है कि कोविड-19 से उपजे हालात सुरक्षित, स्वच्छ और टिकाऊ प्राकृतिक पर्यावरण में रहने की अहमियत को न केवल रेखांकित करते हैं बल्कि उसकी अनिवार्यता परिलक्षित करते हैं।


उम्मीद और प्रार्थना है कि कोरोनावायरस नियंत्रित हो जाएगा और जीवन जल्द ही सामान्य हो जाएगा। हम फिर से अपनी पुरानी भाग-दौड़ वाली जिंदगी में लौट जायेंगे। पुनः हम व्यस्तता, प्रतिस्पर्धा, अपना सर्वोत्तम देने की ललक में मशगूल हो जाएंगे । मेरा मानना है की संक्रमण की इस कठिन घडी में संपूर्ण मानवता को कोरोना के दंश से सीख लेने की अत्यंत आवश्यकता है। हमें समझना चाहिए कि अगर हम प्रकृति से खिलवाड़ बंद नहीं करेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब इंसानो के रूप में हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।


अगर इन विषम परिस्थितियों के अनुभव से अपने भीतर प्रकृति से बेहतरीन सामंजस्य स्थापित करने की भावना विकसित कर सके और  समझदारी से संसाधनों का उपयोग करने का संकल्प ले सके तो हमारी काफी समस्याएं स्वतः ही हल हो जाएँगी। आज आवश्यकता है कि हम प्रकृति से पूर्ण समन्वय स्थापित कर अपने परंपरागत शाश्वत मूल्यों की आधारशिला पर जीवन शैली का निर्माण करे। विशुद्ध भौतिकतावादी दृष्टिकोण त्याग कर हमें परोपकार की भावना से प्रेरित होकर आपसी सहयोगात्मक प्रयासों से समाज हित, राष्ट्र निर्माण, विश्व कल्याण के लिए संकल्पबद्ध होने की जरूरत है, तभी जीवन की सार्थकता सिद्ध हो सकती है।