शिक्षा को राजनीति का मोहरा न बनाएं


‘आधुनिक समय में किया जाने वाला अत्यधिक प्रचार केवल गलत सूचनाएं देने अथवा एक अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए ही नहीं बल्कि सत्य को मिटाने और आपकी समीक्षात्मक सोच को समाप्त करने के लिए किया जाता है।’ गैरी कास्परोव के इस उद्धरण ने हाल ही में मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था कि विशेषतः सीबीएसई के छात्रों के लिए सरकार द्वारा उठाया गया एक सद्भावनापूर्ण कदम किस प्रकार दुर्भावनापूर्ण प्रचार का हिस्सा बन गया। यह दुखद है कि शिक्षा ऐसी तुच्छ राजनीति का शिकार होती है, जहां लोगों का एक निश्चित वर्ग हमेशा सरकार के दूरदर्शितापूर्ण कार्यों की भर्त्सना करने के साथ-साथ हमारे युवा शिक्षार्थियों के मन में भय और भ्रम पैदा करता है।


इस अभूतपूर्व महामारी ने मंत्रालय के समक्ष यह चुनौती प्रस्तुत की है कि सरकार छात्रों को न केवल गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करे, बल्कि उनके लिए एक तनाव-मुक्त वातावरण बनाने पर भी ध्यान केंद्रित करे। इस दिशा में मंत्रालय हमारे छात्र समुदाय से संबंधित सभी मुद्दों के प्रति जागरूकता अपनाते हुए संबंधित उपायों के लिए अथक परिश्रम कर रहा है। अवकाश के दौरान भी बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन का प्रावधान करने, आंतरिक मूल्यांकन के आधार पर छात्रों को अगली कक्षा में प्रोन्नति देने, कक्षा 12 के छात्रों को ‘चयन का अधिकार’ देने और भारत में ई-लर्निंग को बढ़ावा देने जैसे अनुकरणीय निर्णयों को लेने और उनका समर्थन करने के लिए मैं मानव संसाधन विकास विभाग की टीम पर गर्व का अनुभव करता हूं।


हाल ही में सीबीएसई बोर्ड के पाठ्यक्रम के संशोधन को लेकर सामाजिक-राजनीतिक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं से प्रभावित आरोपों की झड़ी लगा दी गई है। कुछ निहित स्वार्थ से ग्रस्त लोग सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध निर्देशों को ‘पढ़ने और समझने’ की बजाय पाठ्यक्रम की तर्कसंगत व्याख्या के लिए इसकी आलोचना कर रहे हैं। यह क्या है और इसे क्यों किया गया है? छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों से प्राप्त अनेक अनुरोधों को ध्यान में रखते हुए सीबीएसई को पाठ्यक्रम संशोधित करने और कक्षा 9 से 12 के छात्रों पर पाठ्यक्रम के बोझ को कम करने की सलाह दी गई थी। हालांकि पाठ्यक्रम को 30 प्रतिशत तक कम किया गया है परंतु यह सुनिश्चित करना विद्यालय प्रमुखों और शिक्षकों का दायित्व होगा कि कम किए गए विषयों को भी विभिन्न विषयों से जोड़ने के लिए आवश्यक जानकारी हेतु छात्रों को समझाया जाए। महामारी से शिक्षा के समय की हानि के कारण यह कदम 2021 में होने वाली वार्षिक परीक्षाओं में छात्रों का बोझ कम करने के एकमात्र उद्देश्य के तहत उठाया गया है।


छात्रों का इन विषयों पर आंतरिक मूल्यांकन और वर्ष के अंत में होने वाली बोर्ड परीक्षा के लिए मूल्यांकन नहीं किया जाएगा। हालांकि सीबीएसई ने स्कूलों को एनसीईआरटी के वैकल्पिक शैक्षणिक कैलेंडर का पालन करने के भी निर्देश दिए हैं। यह कैलेंडर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और इसमें ध्यानाकर्षण के लिए प्रस्तुत किए जा रहे सभी विषयों को इस कैलेंडर में शामिल किया गया है। इस कैलेंडर में प्रत्येक विषय के लिए विशिष्ट शिक्षण योजना है जिसे आमतौर पर घरों में उपलब्ध संसाधनों की मदद से अनुभवात्मक या गतिविधि-आधारित शिक्षण के आधार पर जाना जा सकता है। जैसा कि मैं कहता हूं, ‘शिक्षा से पहले सुरक्षा’। इसलिए वास्तव में ये उपाय छात्रों को होने वाली परेशानियों और तनाव को कम करने में मदद करेंगे। कोविड-19 महामारी के कारण परीक्षाओं के लिए किया गया यह बस एक बार का उपाय है।


इसे कैसे किया गया? युक्तिसंगतता की प्रक्रिया उतनी सीधी नहीं है जितनी इन तथाकथित प्रचार के भूखे लोगों द्वारा मानी जा रही है। हमारे सिलेबस-फॉर-स्टूडेंट्स-2020 अभियान के जरिए मिले सुझावों पर विचार करते हुए, जिसमें 1500 से ज्यादा विशेषज्ञों से सुझाव मिले, और कई सारे विशेषज्ञों की सलाह और सिफारिशों के बाद एक बहुत कठोर कवायद को अंजाम दिया गया। आदरणीय शिक्षाविदों के सुझावों और विशेषज्ञता ने हमें सीखने के परिणामों को अक्षुण्ण रखते हुए ‘न्यायपूर्ण युक्तिसंगतता’ लाने में मदद की है।


राष्ट्रवाद, स्थानीय सरकार, संघवाद जैसे 3-4 विषयों को बाहर रखे जाने के विपक्ष के गलत बयानों के उलट युक्तिकरण सारे विषयों में किया गया है। मिसाल के तौर पर अर्थशास्त्र में ये अपेक्षित विषय हैं फैलाव के उपाय, भुगतान घाटे का संतुलन, आदि। जबकि भौतिकी में ये हीट इंजन और रेफ्रिजरेटर, हीट ट्रांसफर, कनवेक्शन और रेडिएशन आदि हैं। इसी प्रकार गणित में निर्धारकों के गुण, संगतता, असंगतता, द्विपदीय संभाव्यता वितरण और उदाहरणों द्वारा रैखिक समीकरणों की प्रणाली के समाधानों की संख्या। जीव विज्ञान में खनिज पोषण, पाचन और अवशोषण के कुछ हिस्से आदि हैं जिनको मूल्यांकन से छूट दी गई है।


यह तर्क कोई नहीं दे सकता है कि इन विषयों को किसी द्वेष भावना में या किसी सोची समझी योजना के तहत बाहर रखा गया है, जो केवल कुछ पक्षपाती दिमागों की ही उपज हो सकती है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और हमारे युवा शिक्षार्थियों के लिए सीखने की गुणवत्तामूलक प्रक्रिया को सशक्त बनाने और सहायता करने के लिए साहसिक निर्णय ले रहा है। हम ‘सबका ज्ञान-सबके लिए ज्ञान’ के विचार में विश्वास करते हैं और पाठ्यक्रम के माध्यम से अपने प्रभुत्व को मजबूत करने के लिए महज ज्ञान की संरचनाएं बना देने का विरोध करते हैं।


हमें ऐसी ज्ञान व्यवस्था को महत्व देना चाहिए जो छात्रों को ऐसे सच्चे ज्ञान से सक्षम बनाए, जो अनुभवात्मक, समग्र, एकीकृत, सीखने वाले पर केंद्रित और रचनात्मक है। चर्चा छात्रों के विकास और सशक्तीकरण पर होनी चाहिए, न कि उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल करने और उस व्यवस्था का मखौल उड़ाने के लिए, जो युवाओं के जीवन को सशक्त बनाती है। इसलिए मैं विनम्रतापूर्वक सभी से निवेदन करता हूं कि रचनात्मक विचार-विमर्श और कार्यों के जरिए भारत को ज्ञान का केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ें।