एहसास ही जीवन है


एहसास जीवन और समाज के रिश्तों के कर्तव्य दायित्वबोध का जीवन्त महाकाव्य है। एहसास ही जीवन है क्योंकि जब हम एहसास खो देते हैं तो जीने की सार्थकता भी नहीं रहती है। एहसास वह हैं जो भौतिक स्पर्श से अलग मन को छूकर जाते हैं, जिसे हम मस्तिष्क के अचेतन से महसूस करते हैं। एहसास, एक साधारण सा शब्द लेकिन बहुत कुछ कहता है। एहसास आत्मीयता पूर्ण है और रिश्तों को टूटने से बचाता है। खुशी और दर्द भी एहसास है लेकिन सबके मायने अलग-अलग हैं, एक बच्चा गुब्बारा खरीद कर खुश होता है तो दूसरा उसे बेच कर। किसी को सिर्फ खुद के दर्द का एहसास होता है तो कोई दूसरों के दर्द देख कर विचलित और भावुक हो जाता है।


मुझे लगता है कि एहसास ही है जो हमें अच्छा या बुरा बनाता है। एहसास का होना जहाँ जीवन में सकारात्मकता का संचार करता है वहीं इसका अभाव नकारात्मक बना देता है। एहसास ही है जो आगे चलकर हमारे अंदर सेवा, त्याग और समर्पण की भावना जाग्रत करता है बस जरूरत है मन को स्वच्छ रखने की। हमारे एहसास ने ही जीवन-मृत्य, स्वर्ग-नरक और पाप-पुण्य जैसी न जाने कितनी धारणाओं और विश्वासों की स्थापना की है। प्यार का एहसास जीवन को सजाता है तो अभाव वीरान करता है। राम का एहसास मन में सुचिता और नम्रता जाग्रत करता है तो अभाव अहंकार पैदा करता है।


एहसास ही था जिसने बचपन से कबीर के मन में आध्यात्मिक भाव जाग्रत किया और उन्होंने मनुष्य के आंतरिक गुणों पर जोर देते हुए जाति, रंग या पंथ के के बजाय मानवता को सच्चा धर्म बताया। उन्होंने ना केवल भारत की अस्मिता को वाणी दी वरन् ष्अनेकता में एकताश् की स्थापना की और भारत की सदियों पुरानी जीवन प्रणाली को प्रमाणित किया। एहसास के कारण ही कबीरदास जी ऐसे देश की रचना करते हैं, जहां किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है। अगर वहां कुछ है तो सिर्फ प्रेम -

‘‘हम वासी उस देश के जहां बारह मास विलास ।

प्रेम झरै विकसै कंवल तेज पुंज परकास ।।

हम वासी उस देस के जहां जातिबरन कुल नाहीं ।

सबद मिलावा होय रहा देह मिलावा नाहीं ।।’’


एहसास के कारण ही गुरू नानक देव ने ज्ञान, भक्ति और कर्म रुपी त्रिवेणी से भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को एक नई ऊंचाई प्रदान की और आज पूरे विश्व में उनकी वाणी (गुरूवाणी) में भारतीय आध्यात्म एवं जीवन दर्शन पल्लवित-पुष्पित हो रहा है। गुरू नानक जैसे समन्वयवादी संतों ने ही भारत के नाम को वास्तविक अर्थ प्रदान किया है। भारत का आशय ही है भा अर्थात प्रकाश अर्थात ज्ञान के खोज में रत स्थल। गुरू नानक देव के इस दोहे से हम उनके एहसास को समझ सकते हैं -

‘‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत ते सब बंदे।

एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले को मंदे।।’’


एहसास को भावों से, विचारों से, सघन चिंतन की अभिव्यक्ति से सार्थकता हासिल होती है और व्यक्ति अपने मानवतावादी दृष्टिकोण से समाज में व्याप्त असत्य, कुरीतियों एवं मिथ्या अंधविश्वासों के विरोध में सहायक बन सकता है। जीवन में जब यह एहसास हो जाये कि जीवन नश्वर है, क्षण भंगुर है दोबारा नहीं मिलने वाला है इसलिए इसे सार्थक जियो। जीवन में जो कुछ हमसे मूल्यवादी व न्यायोचित हो जाये केवल उसी का अर्थ है। जीवन ऐसा जीना है कि अन्तिम समय जब भी आये तब हमें किसी बात का अफसोस न हो। जब यह नश्वरता और क्षण भंगुरता का बोध हमारे जीवन राग को सघन करने लगे तब हम कह सकते हैं कि एहसास ही जीवन है। एहसास ही है जो किसी के लिए जीवन बन गया और किसी के लिए दुनिया को देखने का एक नया तरीका।


प्रकृति भी एहसास ही है ईश्वर का। भगवान शिव की जटाओं से गंगा निकलती है तो वह स्थान गंगोत्री प्रकृति ही तो है। देव पर्वतों पर रहते हैं तो वह पर्वत प्रकृति ही तो है। जंगल से नाना प्रकार की वनस्पतियां और अन्न-अनाज की प्राप्ति होती है तो वह अन्नपूर्णा प्रकृति ही तो है। हमारी संस्कृति में भी अहसास का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है जो हमें प्रकृति के हर कण में ईश्वर की अनुभूति करता है। एहसास ही है जो गंगा जल को अमृत-तुल्य बनाता है और शायद एहसास का अभाव ही है जिसके कारण हम अमृत-तुल्य नदियों और स्पर्श गंगाओं को प्रदूषित कर रहें हैं।


बढ़ती जरूरते और भागदौड़ के कारण आज हम अपने जिन्दगी के एहसास को भूलते जा रहे है। मुझे लगता है कि कुछ ऐसे एहसास हैं जिसे हर इंसान को जीवन में बार-बार जरूर महसूस करना चाहिए जैसे अपने सपने को पूरा करने के लिए की गयी ईमानदार मेहनत से मिलने वाले सुकून का एहसास, किसी बेजुबान की आवाज और किसी बेसहारे का सहारा बनकर इंसानियत पर यकीन कायम करने का एहसास, खुद की ताकत और कमजोरियों को पहचानने का एहसास, किसी का मित्र या सहारा बनकर उसे खुद से भी आगे निकलते देखकर होने वाले गर्व का एहसास, हवा के साथ गुनगुनाने का एहसास, रोते हुए को हँसाने का एहसास और पेड़-पौधों, नदी-तालों के स्पर्श से प्रकृति के सामिप्य का एहसास।


मैं बताना चाहूंगा कि मेरे लिए लेखन भी एक खूबसूरत सा एहसास है क्योंकि बचपन से ही लिखना मुझे सशक्त करता रहा है। कभी-कभी अथक परिश्रम और प्रयासों के बावजूद भी भावनाओं के टूटने का दर्द सहना पड़ता है। इससे उत्पन्न नकारात्मकता और पीड़ा को मैं लेखन के द्वारा ही कल्पना-शक्ति और रचनात्मकता में परिवर्तित कर पाता हूँ। अपने संघर्षों और उनसे प्राप्त अनुभवों को लिखने में जो अनुभूति प्राप्त होती है। वह अनुभूति मुझे सम्पूर्ण रूप से सशक्त करती है और मुझे लिखते समय एहसास होता है कि ये अनुभव और मेरे जिंदगी के सबक शायद युवा पीढ़ी का भविष्य में मार्ग प्रशस्त्र करेंगे। मेरी माँ भी मेरे लिए एक जीवंत एहसास है जिसे मैं अपनी प्रेरणा के रूप में महसूस करते रहता हूँ और इस प्रेरणा को मैंने अपने गीत संग्रह ष्भूल पाता नहीं” के एक गीत में ”मेरी माँ“ शीर्षक से आकर देने की कोशिश भी की है।

”मुझे जीवन दिया तूने, मुझे चलना सिखाया ।

मिटा अँधियारा रोशन, मेरा जीवन बनाया ।।

तेरे संस्कारों का पाठ हूँ में तो, मेरे जीवन का चन्दन तू है।

किया संघर्ष तूने आजीवन है, मेरी माँ तुझे मेरा वन्दन है।।“


रक्षाबंधन पर्व में भी भाई-बहन के स्नेह का एहसास है। जिसमें बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षाबंधन बांधकर उनकी लंबी उम्र और कामयाबी की कामना करती हैं और बदले में भाई अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देते हैं। यह एहसास ही था जिसके कारण मेवाड़ की महारानी कर्मावती द्वारा भेजी राखी का मान रखते हुए मुगल बादशाह हुमायूं ने मेवाड़ पहुंचकर बहादुरशाह से युद्ध कर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की थी। यह एहसास ही था जिसके कारण सिकन्दर की पत्नी ने अपने पति के हिन्दू शत्रु पुरूवास को राखी बाँधकर अपना मुँहबोला भाई बनाया और पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बँधी राखी और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकन्दर को जीवन-दान दिया। यह एहसास ही था जिसके कारण विश्वकवि रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इस पर्व पर बंग-भंग के विरोध में जनजागरण किया था और इस पर्व को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था और लोग गंगा स्नान करके सड़कों पर यह कहते हुए उतर आये-

”सप्त कोटि लोकेर करुण क्रन्दन, सुनेना सुनिल कर्जन दुर्जन ।

ताइ निते प्रतिशोध मनेर मतन करिल, आमि स्वजने राखी बन्धन ।।“


वक्त के साथ-साथ भाई-बहन के पवित्र बंधन के इस पावन पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में विविधता आई है लेकिन एहसास वही है। मेरा मानना है कि यह भी एक सुखद एहसास होगा जब इस पर्व को पूर्णता देते हुए हमारी बहनें और मातृशक्ति सिर्फ अपने भाई ही नहीं बल्कि वृक्षों, नदियों या समीप के जलस्रोत्रों को रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा शुरू करेंगी और भाईयों से प्रकृति एवं देश की रक्षा करने का संकल्प लेगी। क्योंकि मानव का अस्तित्व जीव-जन्तु, पेड़-पौधों और वनस्पतियों पर आधारित है इसलिए इनकी रक्षा करना प्रत्येक मानव का नैतिक कर्तव्य बनता है।


रक्षाबंधन पर्व पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनायें !