ग्राम स्वराज : लोकल से ग्लोबल की और कदम

स्वदेशी के विचार को जीवन में धारण करने से जहां हम स्वयं मजबूत होंगे, वहीं गांव, शहर और देश भी स्वावलंबन की दिशा में कदम बढ़ाएगा। अपनी देशज व्यवस्था के अनुशरण से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तीनों ही बातें गांव के इर्द-गिर्द स्थापित होगी और लघु और कुटीर उद्योगों के प्रोत्साहन से पलायन की नौबत भी नहीं आएगी।



भारतीय संस्कृति दुनिया की एक अद्वितीय मिसाल है, जो मुख्य रूप से नैतिकता और अध्यात्म पर टिकी हुई है। विश्व की कुछ महत्वपूर्ण संस्कृतियां जैसे बेबीलोन, इजिप्ट, ग्रीस, रोम आदि की संस्कृति एक समय में ऊँचे उठकर कुछ काल उपरांत नष्टप्राय हो गई, परंतु भारतीय संस्कृति आज भी जीवित है। प्राचीन भारत में भौतिकता व अध्यात्म का अद्भुत समन्वय प्रत्येक गांव में बहता था। परंतु विडम्बना यह है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपने गांव को हेय दृष्टि से देखने लगे है।


गांव उतने ही पुराने हैं, जितना पुराना यह भारत है। गांवों की सेवा करने से ही सच्चे स्वराज्य की स्थापना होगी। ग्राम स्वराज का सही तात्पर्य है स्वयं के उपभोग के लिए स्वयं का उत्पादन, उद्योग कौशल, व्यावहारिक शिक्षा और आर्थिक सम्पन्नता। अपनी जरुरत के लिए अनाज, दूध, साग-भाजी, फल, कपास आदि खुद गांव में पैदा हो अथार्त प्रत्येक गांव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के मामले में स्वावलंबी हो। ग्राम स्वराज्य में उचित आर्थिक व्यवस्था के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के प्रति जागरूक होना भी आवश्यक है।


मैंने अपने पिता को कई बार कहते हुए सुना कि “उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ठ चाकरी भीख निदान"। अथार्त खेती करना सबसे अच्छा कार्य है उसके पश्चात व्यापार है। किसी दूसरे के पास नौकरी करना निकृष्ट और भीख मांगने के समान है। हमारे बुजुर्गों की स्वालम्बन को सर्वश्रेष्ठ मानने के कारण ही 17वीं सदी तक भारत की जो आर्थिक सम्पदा थी वो गांवों और घरों से आती थी। गांवों के समूह आपस में एक दूसरे पर निर्भर थे। भारत पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर था। गांव खुशहाल थे। सामाजिक व्यवस्था एक दूसरे पर अवलंबित थी। इसी अवलंबन के भाव के कारण ही हर परिवार की व्यवस्थाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं। इस कारण शहर ही नहीं गांव भी आत्मनिर्भर थे। भारत के गांवों में कृषि एक ऐसा उद्योग था, जिस पर गांव ही नहीं शहरों की भी व्यवस्थाएं होती थीं। इसके साथ ही लगभग हर घर में कुटीर उद्योग जैसी व्यवस्था संचालित होती थी। आर्थिक इतिहासकार अंगस मैडीसन की पुस्तक द वर्ल्ड इकॉनमी: ए मिलेनियल पर्स्पेक्टिव (विश्व अर्थव्यवस्था: एक हज़ार वर्ष का परिप्रेक्ष्य) के अनुसार भारत विश्व का सबसे धनी देश था और 17वीं सदी तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था था।

अंग्रेजो के आने से पूर्व तक भी पूरे विश्व में स्थल और जल मार्ग से भारत का व्यापार होता था। हमारे लोकल प्रोडक्ट ग्लोबल हुआ करते थे। भारतीय कपडें की विदेशी में बड़ी माँग थी। विश्व के लगभग हर भाग में भारत से कपड़ा जाता था। भागलपुर की रेशमी साड़ी, जो माचिस की डिबिया में समा जाती थी और ढाका की मलमल संसार-प्रसिद्ध थी। भड़ौच में निर्मित `बफ्ता' वस्त्र की सारे देश और विदेशों में बड़ी मांग थी। सोने और चाँदी के तार पड़े बढ़िया और कीमती कपड़ों के लिए सूरत, आगरा, बनारस और अहमदाबाद प्रमुख केन्द्र थे। कश्मीर के शाल, कम्बल, पट्टू और पश्मीना प्रसिद्ध थे। बंगाल से न केवल बड़ी मात्रा में सिल्क का निर्यात होता था, बल्कि सिल्क का कपड़ा भी बनता था। बनारस सिल्क की साड़ी और सिल्क पर जरी के कार्य के लिये प्रसिद्ध था। सूरत में सिल्क की दरियां बनती थी। दक्षिण भारत की खानों से हीरे निकाले जाते थे। मैसूर में सन्दल की लकड़ी पर सुन्दर कारीगरी का कार्य होता था। दिल्ली चमड़ा उद्योग के लिये प्रसिद्ध था। जयपुर, बनारस, लखनऊ, दिल्ली, ग्वालियर मिट्टी के बर्तनों के उद्योग के मुख्य केन्द्र थे। बनारस, लाहौर और कैम्बे इत्र-निर्माण के केन्द्र थे। दिल्ली, आगरा, बयाना, पटना, बरार और लाहौर चीनी-उद्योग के लिये प्रसिद्ध थे। अंग्रेज और डल व्यापारी भारत से चीनी का निर्यात करते थे। गोलकुण्डा में उच्चकोटि का लोहा और स्टील का निर्माण होता था। कालिंजर, ग्वालियर, सुकेत मण्डी (लाहौर) में लोहे की खानें थीं।


मुगल काल में हमारे गावों में जमींदारी-जागीरदारी के कुछ कड़वे अनुभव तो हुए परंतु गांव का संगठन सुरक्षित था। जबकि ब्रिटिश साम्राज्य में गावों के संगठन पर गहरा आघात किया गया। मालगुजारी प्रथा, लगान नगद में प्राप्त करना, कृषकों को कोई संरक्षण न देना, घर-घर अपनाए सूती वस्त्र उद्योगों को नष्ट करना, लघु और कुटीर उद्योगों का पतन, पंचायतों के अस्तित्व की समाप्ति आदि ने ग्राम संगठन की नींव हिला दी। धीरे-धीरे भारत कच्चे माल का निर्यातक और पश्चिम देशों के औद्योगिक माल का आयातक बन गया और गावों में गरीबी तथा बेरोजगारी व्याप्त हो गई। जिसके परिणामस्वरूप जो शहर पहले गावों पर निर्भर थे, अब वो गांव शहरों पर निर्भर हो गए।


अंग्रेजों की चालाकी और उनकी थोपी गई शिक्षा के कारण धीरे-धीरे लोगों की अभिरुचि में बदलाव आने लगा। यूरोपीय वेशभूषा और यूरोपीय रहन-सहन अंग्रेजी शिक्षित वर्ग को प्रलोभित करने लगा। परिणाम स्वरुप आधुनिकता के नए दौर में नई पीढ़ी के लिए निकृष्ट नौकरी सबसे बढ़िया पेशा बन गया और अन्नदाताओं का उत्कृष्ट कार्य कृषि हाशिये पर चला गया।

पिछले 70 वर्षों में भारत ग्लोबल से लोकल की लकीर पर चला। जिस ग्राम स्वराज को शक्ति देकर रामराज्य की बात गांधी जी ने कही थी वो लुप्त हो गया और भारत में बनी चीजें ग्लोबल मार्केट की प्रतिस्पर्धा में दम तोड़ती रहीं। आज यह महामारी दुनिया को अपने अस्तित्व का बोध करा रही है। यह अस्तित्व बोध भारत के लिए एक सीख है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने देश की जनता के दिलों में एक नवीन आशा का सूत्रपात किया है। प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में तालाबंदी के चौथे चरण को नये स्वरूप में लाने की बात कहते हुए 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की शुरूआत कर 20 लाख करोड़ रूपये के पैकेज की घोषणा की। उन्होंने 'लोकल के लिए वोकल' बनने की बात करते हुए कहा कि आज हमारे पास साधन हैं, सामर्थ्य है और सबसे अच्छी प्रतिभाएं हैं। हम अच्छे और गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाकर, आपूर्ति चैन को आधुनिक बनाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना के तहत किया जा रहा कार्य निसंदेह स्वागत योग्य है।


मैंने राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के रजत जयंती समारोह के अवसर पर नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, 'जर्नी ऑफ टीचर एजुकेशन: लोकल टू ग्लोबल' के उद्घाटन अवसर पर पूर्व में भी कहा था कि जो जड़ों से जुड़कर काम करता है, वही आगे जाकर ग्लोबल होता है। हमें सभी देशो की संस्कृतियों को एकजुट करने वाले गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के शिक्षा दर्शन को समझते हुए विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा देनी है जो बच्चों के परिवेश और जीवन-व्यवहार से जुडी हो, जो उनके भीतर छिपी रचनात्मक ऊर्जा को प्रोत्साहित करती हो। हमें श्रेष्ठ शिक्षक और दार्शनिक गुरुदेव टैगोर के “विचार वैश्विक और कृति स्थानिक” (थिंक ग्लोबल एक्ट लोकल) भाव को आत्मसात करना होगा एवं विद्यार्थियों में नैसर्गिक विकास के महत्व को समझते हुए उनमें गांव, संस्कृति, श्रम के प्रति लगाव का भाव जाग्रत कर टैक्नालॉजी, वैज्ञानिक क्षमताओं, हस्त शिल्प, सृजनात्मकता के द्वारा आत्मनिर्भर बनने हेतु प्रेरित करना होगा।


वर्तमान समय में हम जिन परेशानियों अथार्त कोरोना संक्रमण से जूझ रहे हैं और शांति-शुचिता का मार्ग तलाश कर रहे हैं, वह मार्ग हमें ग्राम स्वराज के रास्ते पर चलकर ही प्राप्त हो सकता है। स्वदेशी के विचार को जीवन में धारण करने से जहां हम स्वयं मजबूत होंगे, वहीं गांव, शहर और देश भी स्वावलंबन की दिशा में कदम बढ़ाएगा। अपनी देशज व्यवस्था के अनुशरण से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तीनों ही बातें गांव के इर्द-गिर्द स्थापित होगी और लघु और कुटीर उद्योगों के प्रोत्साहन से पलायन की नौबत भी नहीं आएगी।