ग्रामवास, ग्रामायण और ग्राम-स्वराज

अपडेट करने की तारीख: 15 मई 2020

‘मेक इन रूरल इंडिया’ के द्वारा उत्कृष्ट, समृद्ध और आत्मनिर्भर गावों की नींव रखनी होगी। अब ग्राम्य-संस्कृति की पहचान रहे प्राचीनतम मूल्यों की घरवापसी का स्वर्णिम अवसर है। संतुलित और सतत विकास, सीमित उत्पादन और संयमित उपभोग ही भविष्य का रास्ता है।

गांधी जी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है, लेकिन आज इस बदलाव के दौर में यह परिभाषा बदलती जा रही है। वैश्वीकरण के इस आपाधापी विकास में सबसे अधिक नुकसान गांव की आत्मा कही जाने वाली खेती को हुआ है। खेती तो है पर उसमें खेती करने वाले खेतीहर कम हो रहे हैं। यह हमारी शहरी और तथाकथित बुद्धिजीवी सोच का नतीजा है जिसमें यह माना जाता है कि खेती करना केवल उनका काम है जो गरीब, बेरोजगार या जिनके पास कोई खास डिग्री या सर्टिफिकेट नही है। काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने वाले ग्रामीणों की संख्या बढ़ती जा रही है। गांव के लोग अब शहर की ओर कदम बढ़ा रहे हैं और शहर की संस्कृति गांवों में अपने पैर पसार रही है। गांव तो जिंदा हैं मगर गांव की संस्कृति मर रही है। आज गांव न सिर्फ आकर्षण खो रहा है बल्कि वह हमारे मुख्यधारा की चीजें जैसे साहित्य व फिल्मों से भी दूर हो रहा है। साहित्य और फिल्में समाज का आईना हैं। ये वही दिखाती है जो वर्तमान समाज से प्रतिबिंबित हो रहा हो। इसलिये शायद अब किसी फ़िल्म में बैलों से खेती होती नही दिखती, बिरले ही किसी साहित्य में प्रेमचंद का 'पंच परमेश्वर', 'ईदगाह' या 'दो बैलों की कथा' सी जीवंतता नजर आती है। हमें याद रखना होगा कि अंग्रेजो के आने से पहले भारत की जो आर्थिक सम्पदा थी वो गांवों और घरों से आती थी। कपड़े, मसाले आदि इन्हीं जगहों से निकलकर यूरोप और एशिया के बाजारों में जाते थे। भारत इस धरती का सर्वाधिक समृद्ध देश था। पूरे विश्व में स्थल और जल मार्ग से भारत का व्यापार होता था। भारतीय कपड़ों की विदेशों में बड़ी माँग थी। ढाका की मलमल संसार में प्रसिद्ध थी। आभूषण उद्योग विश्वव्यापी था। दक्षिण भारत की खदानों से निकले हीरे के आभूषण विश्व प्रसिद्ध थे। चिकित्सा, विज्ञान, संगीत, साहित्य, ललित-कला में भारत संसार का गुरु रहा है। गांवों के समूह आपस में एक दूसरे पर निर्भर थे। अंग्रेजों ने आते ही इस व्यवस्था को बड़ी चालाकी से खत्म कर दिया। मेरा मानना है कि गांव हैं तभी खेती है, गांव हैं तभी यह देश कृषि प्रधान राष्ट्र है। गांव से ही इस मिट्टी की मूल संस्कृति है। अतः इसका विकास तभी हो सकता है जब हम एक गांव की मुलभूत बातों को संरक्षित रखते हुए ही उसका विकास करें। कृषि आधारित ग्रामीण उद्योग कैसे बढ़े इसकी चिंता हम सभी को करनी है। आधुनिक विज्ञान का उपयोग गांव में बैठे बच्चों की शिक्षा के लिए करना होगा। ‘मेक इन रूरल इंडिया’ के द्वारा उत्कृष्ट, समृद्ध और आत्मनिर्भर गावों की नींव रखनी होगी। अब ग्राम्य-संस्कृति की पहचान रहे प्राचीनतम मूल्यों की घरवापसी का स्वर्णिम अवसर है। संतुलित और सतत विकास, सीमित उत्पादन और संयमित उपभोग ही भविष्य का रास्ता है।

महात्मा गांधी ने देश जिस स्वराज्य की परिकल्पना की थी उसकी बुनियाद देश के लाखों गांवों के विकास पर टिकी हुई है। उनका दृढ़ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गांव स्वतंत्र, शक्तिशाली और स्वावलंबी बनकर उसके सम्पूर्ण जीवन में पूरा भाग नहीं लेते, तब तक भारत का भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता। हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी स्वयं देशवासियों को स्वदेशी और स्वावलंबन हेतु प्रेरित कर आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को साकार करने हेतु कटिबद्ध हैं। विगत माह पंचायती राज दिवस के अवसर पर अपने एक महत्वपूर्ण संबोधन में माननीय प्रधानमंत्री जी ने ग्राम स्वराज की स्थापना पर बल देते हुए कहा था कि हर गांव को अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त रूप से आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा। इसी तरह हर जिले को अपने स्तर पर आत्मनिर्भर बनना है, हर राज्य को अपने स्तर पर आत्मनिर्भर बनना है और पूरे देश को अपने स्तर पर आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा। दो दिन पूर्व माननीय प्रधानमंत्री जी ने 20 लाख करोड़ रूपये के अभूतपूर्व आर्थिक पैकेज की घोषणा के साथ देशवासियों को अपने सम्बोधन में लोकल मैन्युफैक्चरिंग, लोकल मार्केट, लोकल सप्लाई चेन के महत्व को समझाते हुए कहा कि कोरोना संकट के समय में, लोकल ने ही हमारी डिमांड पूरी की है, हमें इस लोकल ने ही बचाया है। लोकल सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। इसलिए, आज से हर भारतवासी को अपने लोकल के लिए वोकल बनना है, न सिर्फ लोकल प्रोडक्ट्स खरीदने हैं, बल्कि उनका गर्व से प्रचार भी करना है। संयोगवश कोरोना जैसी आपदा ने, समाज की सबसे छोटी इकाई को पुनः समृद्ध कर राष्ट्र को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने का अवसर उपलब्ध कराया है। भारत ऋषि और कृषि का देश है। कृषि वैज्ञानिकों को भारत की भूमि और जलवायु को देखते हुए शोध एवं अनुसंधान करना होगा। स्वदेशी और स्वावलंबन की ताकत के बल पर भारत विश्व का मैन्युफैक्चरिंग हब तो बनेगा ही, हमारे युवाओं को लाभकारी रोजगार भी मिलेगा और कृषि का विकास भी होगा। जब श्री राम द्वारा धर्म की रक्षा हेतु 14 वर्ष के वनवास को अंगीकार किया गया और रावण का अंत कर, धर्म की स्थापना कर लौटे तो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। उनके श्री राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनने की कथा रामायण कहलाई। आज जरूरत है देश की खुशहाली हेतु युवाओं का अपने गांवों की और प्रस्थान कर ग्रामवास को अंगीकार करना अथार्त देश के नवनिर्माण में युवाओं के विजयपथ 'ग्रामायण' की।


मेरा देश की युवा शक्ति से निवेदन है कि अपने गांव व आसपास के खेत, चरागाह, वन, जलस्रोत सुधारकर गांव के दीर्घकालीन विकास व गांव के पर्यावरण की रक्षा की जिम्मेदारी को संभाले। राष्ट्र-निर्माण हमारा उत्तरदायित्व ही नहीं, अपितु सामूहिक और सहकारी कर्तव्य-बोध है।