श्रीकृष्ण अथार्त प्रकृति के संरक्षण-संवर्धन का जीवन-दर्शन

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मानवता को प्रेम और प्रकृति से अवगत कराने के लिए हुआ है। प्रेम की प्रवृत्ति और प्रकृति से प्रेम इन दोनों के सही रूप को पहचाने बिना जीवन नीरस हो जाता है। जहाँ प्रेम मनुष्य हृदय की सर्वोत्कृष्ट वृत्ति है, वहीं प्रकृति के माध्यम से ईश्वर-मानव संवाद संभव है। सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम और उसके संरक्षण-संवर्धन के कारण ही श्रीकृष्ण लोकनायक के रूप में स्थापित हुए।


भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति के सबसे बड़े रक्षक है और देव-प्रेत पूजा से हट कर प्रकृति से प्रेम करना सिखाते हैं। श्रीकृष्ण प्रकृति के कितने बड़े सचेतक और संरक्षक हैं इसका पता उनके द्वारा उपयोग की जाने वाली प्रिय वस्तुओं के अवलोकन से चलता है। उनकी प्रिय कालिंदी, गले में वैजयन्ती माला, मस्तक पर मयुरपुच्छ,अधर पर विराजती बांस की बनी मुरली, कदम्ब की छाँव और उनकी प्रिय धेनु ये सभी श्रीकृष्ण के प्रकृति प्रेम को दर्शाते हैं। मस्तक पर मयुरपुच्छ का मुकुट, गले में वैजयन्ती माला, कानों में सुन्दर कर्णिकार पुष्प और अधर पर विराजती बांस की बनी मुरली में अमृत स्वर भरते हुये रमणीय वृन्दावन में प्रवेश करने के स्वरुप का अगर मनन करो तो श्रीकृष्ण के प्रकृति प्रेम से अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते। गाय ही क्यों, मोर, पक्षी, फसलें, पर्वत, कंदराएं और यमुना, जो भी भरण-पोषण करे, आपको संरक्षण दे, उसको प्रेम करना और उसके होने का सम्मान करना सिखाते हैं।


उन्होंने गोवर्धन पर्वत की रक्षा करके दुर्लभ वनस्पतियों का संरक्षण किया। गोवर्धन पर्वत के माध्यम से समझाते हैं कि प्रकृति की रक्षा सर्वोपरि है। यदि हम प्रकृति का संरक्षण-संवर्धन नहीं करेंगे तो हमारे लिए प्राकृतिक संसाधनों का संकट उत्पन्न हो जाएगा, इसलिए पृथ्वी का हरा भरा रखने के लिए वृक्षारोपण के साथ-साथ उनकी देखभाल भी करें। यमुना के जल में विष-वमन करने वाले कालिया के कारण जब सारा गोकुल-वृन्दावन का जीवन अस्वस्थ हो गया था। तब छोटे गोपाल ने कालिया नाग के मस्तक पर काल-नृत्य किया और कालिया नाग को हराकर नदियों को प्रदूषण से मुक्ति का संदेश दिया। वास्तव में कालिया नाग प्रदूषण का प्रतीक है। हमारे देश की अधिकतर नदियां अभी भी प्रदूषण के जहर से आहत हैं। श्रीकृष्ण ने कालिया नाग के माध्यम से समझाते हैं कि नदियों को प्रदूषण से मुक्त रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। अगर हम अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं तो इसका नुकसान भी हमें ही उठाना होगा। गीता के विभूतियोग में भगवान श्रीकृष्ण ने पीपल और गंगा को अपनी विभूति बतलाते हुए मानव को पर्यावरण संरक्षण का सन्देश देते हुए कहा है-'अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम्' अर्थात् हे अर्जुन! वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ। 'स्रोतसामस्मि जाह्नवी' अर्थात् नदियों में गंगा हूँ।


भगवान श्रीकृष्ण का जीवन प्रकृति के बहुत करीब रहा है। प्रकृति के लिए उनके मन में जो अपनत्व रहा वो समाज और राष्ट्र के सरोकारों से भी जोड़ने वाला है। श्रीकृष्ण एक ऐसी जीवनशैली सुझाते हैं जो सार्थकता और संतुलन लिए हो। यानि कि सम्पूर्ण प्रकृति से प्रेम। यही अलौकिक प्रेम हम सभी को आत्मीय सुख दे सकता है और इसी में समाई है जनकल्याणकारी चेतना भी। कदम्ब का पेड़, यमुना का किनारा, गायों की सेवा और पक्षियों से प्रेम यह बताता है कि जीवन प्रकृति से ही जन्म लेता है और मां प्रकृति ही इसे विकसित करती है, पोषित करती है। मुझे लगता है कि जब हमारे मन में इस चेतन तत्व का विकास होगा तभी आत्मतत्व जागृत हो पायेगा। प्रकृति से जुड़ा सरोकार का ये भाव ही मानवीय सोच को साकार करने वाला है।


भगवान श्रीकृष्ण प्रेम ही नहीं, बल्कि कर्म और धर्म का ज्ञान देने वाले गुरु भी है। श्रीकृष्ण शिक्षा को भी प्रेम के स्तर पर ले कर आते है। अर्जुन को सबसे महान उपदेश देते हुए कहीं भी उन्होंने गुरु का स्थान नहीं लिया। हमेशा एक सखा के रूप में मार्गदर्शन कर शिक्षा को मैत्रीपूर्ण संवाद में ढाल दिया। उन्हे यह ज्ञात है कि बड़ी से बड़ी शिक्षा भी मित्र से ग्रहण करना कितना सरल है और सदा स्मृत रहती है। देश, काल, पात्र, अवस्था, अधिकार आदि भेदों से व्यक्ति के जितने भिन्न-भिन्न धर्म अथवा कर्तव्य हुआ करते हैं उन सबमें कृष्ण ने अपने विचार, व्यवहार और आचरण से एक मित्र की भांति सभी का पथ प्रदर्शन किया है।


मैं समझता हूँ कि श्रीकृष्ण एक जीवन दर्शन है जो पग-पग पर हमें सही दृष्टिकोण प्रदान करने में सहायक है। ज्ञान, कर्म और योग के समन्वय से जीवन में आशा का संचार करता है, जीने की कला सिखाता है तथा जीवन सफल बनाता है। उनका जीवन गाँव व नगर की संस्कृति को जोड़ता है, गरीब को अमीर से जोड़ता है और रूढ़िवादिता का प्रतिकार करता है। उनके व्यक्तित्व में भारत को एक श्रेष्ठ लोकनायक ही नहीं मिला वरन् एक महान कर्मयोगी और दार्शनिक भी प्राप्त हुआ, जिसका गीता ज्ञान समस्त मानव-जाति के लिए पथ-प्रदर्शक है।


शाश्वत प्रेम और प्रकृति के संरक्षण-संवर्धन का सन्देश देने वाले भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव "जन्माष्टमी" पर समस्त देशवासियों को हार्दिक शुभकामनायें !