आइये, बच्चों और किशोरों के लिए सक्रिय और निवारक मानसिक स्वास्थ्य को सक्षम करें।


COVID-19 आसमान से गिरी बिजली की तरह समुदायों के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय रहा है। जहां वायरस लगने का भय बना हुआ है, वहां सामाजिक दूरी, लॉक डाउन, समुदाय का इस वायरस के विरुद्ध संघर्ष में अनिश्चितता के साथ मानसिक कष्ट भी बढ़ गया है। मानसिक संकट को शब्दों में समझा पाना कठिन होता है, परंतु यह भय, चिंता, दुःख, असुरक्षा या थ्रेट की भावना ही होती है जो कि अचानक आपको परास्त कर सकती है। एक पल जब आपके विचार आप पर हावी होने लगते हैं, आप एक चमकदार धूप के दिन शांत और अंधेरा महसूस करते हैं।एक ही भावना, अनिश्चितता और भावनात्मक कमजोरी की भावना के साथ आपके शरीर को बर्बाद करने लगती है।

Covid-19 के कारण लाया गया भावनात्मक संकट पहले से ही कमजोर बच्चों और किशोरों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण रहा है। किशोरावस्था के समय में गरीबी, दुर्व्यवहार या हिंसा के कारण कई शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक बदलाव आते हैं। आईसीएमआर (2017) से पता चलता है कि भारत में 10-13% बच्चे और किशोर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से जूझ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत तथा विश्वभर में इस महामारी के कारण उनकी संख्या में वृद्धि होगी। छात्रों में चिड़चिड़ापन, घबराहट और बेचैनी बढ़ गई है जबकि वे दूरस्थ शिक्षा के नए न्यू नॉर्मल' का पालन कर रहे हैं।मानसिक कुशलता की गंभीरता को समझने की जरूरत है।मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली परस्पर जुड़ी हुई शक्ति के रूप में है जो अन्य भागों के कार्य को भी प्रभावित करती है।इसलिए, सही समय पर मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान न देने से यह वयस्कता तक बढ़ सकता है और इससे शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा पे चर्चा 2.0' में उल्लेख किया था कि, "अवसाद और खराब मानसिक स्वास्थ्य चिंता का कारण हैं। हालांकि, इनसे संबंधित पहलुओं को हल किया जा सकता है। शुरुआती लक्षणों पर ध्यान दें, चर्चा करें, समर्थन दें और यदि आवश्यक हो, तो परामर्शदाता (काउंसलर) से मिलने में संकोच न करें। इसी भावना से शिक्षा मंत्रालय ने वर्षों के दौरान अपने प्रयासों में विस्तार किया है। हमारे विद्यार्थियों की शैक्षिक सफलता और खुशहाली हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। वर्षों के दौरान विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रयास किए गए हैं। मानसिक कुशलता की आधारशिला रखने के लिए सभी स्कूलों और कॉलेजों में परामर्शदाता का होना आवश्यक है, जिसके द्वारा प्रत्येक स्कूल में सीबीएसई संबद्धता उपनियम का आदेश दिया जाता है। यूजीसी के दिशानिर्देशों, 2015 के अनुसार सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में 'छात्र परामर्श प्रणाली' (Students Counselling System) होनी चाहिए।

बहरहाल, Covid-19 के कारण लॉकडाउन के चलते, विद्यार्थियों के लिए दूरस्थ शिक्षा का विस्तार किया गया है।मानसिक स्वास्थ्य को सुयोग्य बनाने के लिए भी परिवर्तन की आवश्यकता है, ताकि अनिश्चितता के वातावरण में भी विद्यार्थियों को पर्याप्त मार्गदर्शन और परामर्श दिया जा सके। इस प्रकार मंत्रालय ने ऑनलाइन अध्ययन के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे और साइबर सुरक्षा में शामिल है कि तनाव कैसे दूर किया जाए, यहां 'सहयोग' पर लाइव इंटरेक्शन सत्र का सीधा प्रसारण (स्वयंप्रभा चैनल पर) भी किया गया है। एनआईओएस ने इसी तरह मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों योग, ध्यान, नृत्य, कला, चित्रकला और वर्चुअल समर कैंप में संगीत का आयोजन किया है। इसके साथ ही, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम 'निष्ठा' द्वारा शिक्षकों को ऑनलाइन मॉड्यूल के माध्यम से मानसिक कुशलता के मुद्दों से निपटने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य खुशहाली पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है। AICTE ने बड़ी संख्या में संकाय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए थे तथा 10,000 से अधिक संकायों को प्रशिक्षित किया गया है एवं सभी प्रभावी परामर्शदाता हैं। यूजीसी ने अपील जारी कर मानसिक स्वास्थ्य, मनोसामाजिक चिंताओं और परिसर में हर किसी की भलाई से संबंधित सूचनाएं तथा परामर्श जारी किए हैं।हालांकि समय चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन प्रयासों में और अधिक वृद्धि हुई हैं; मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य के लिए हेल्पलाइन की स्थापना की गई है, साथ ही जरूरतमंद छात्रों की पहचान तथा तत्काल आवश्यक सहायता प्रदान करने के लिए COVID-19 सहायता समूहों की स्थापना की गई है।

प्रयास यहीं समाप्त नहीं हुए हैं। वर्ष 2020 के विश्व मानसिक स्वास्थ्य थीम के साथ शिक्षा मंत्रालय मानसिक स्वास्थ्य को एक मानवाधिकार के रूप में स्थापित करता है। मैं इस बात पर बल देता हूं कि मानसिक स्वास्थ्य सबको उपलब्ध होना चाहिए। सुविधाओं तक अधिक व्यापक पहुंच के लिए अधिक निवेश की आवश्यकता है। इस प्रकार केंद्रीय वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारामन जी ने COVID-19 के दौरान आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत छात्रों, परिवार के सदस्यों तथा अध्यापकों की मानसिक कुशलता के लिए मनोदर्पण की घोषणा की थी।शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक मुद्दों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों के साथ एक कार्यदल का गठन किया गया था। पर्याप्त मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करने के साथ-साथ समूह मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों और छात्रों की चिंताओं पर निगरानी रखने और उन्हें पूरा करने के लिए उत्तरदायी होगा। परामर्श सेवाओं, ऑनलाइन संसाधनों और हेल्पलाइन, एक वेबसाइट और टोल फ्री नंबर (8448440632) के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक पहलुओं को संबोधित करने के लिए सहायता सक्षम की जाएगी।

मानसिक स्वास्थ्य को सक्षम बनाने के लिए जिस रणनीति को लागू किया जा रहा है उसके अंतर्गत विद्यार्थियों, अभिभावकों तथा शिक्षकों को स्थायी मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। हमें यह महसूस करना होगा कि मानसिक स्वास्थ्य व्यक्तियों के सर्वांगीण विकास के लिए एक अनिवार्य घटक है। अब से, शिक्षा मंत्रालय यह सुनिश्चित करेगा कि सक्रिय और निवारक मानसिक स्वास्थ्य तथा वेलबियिंग सेवाएं मुख्य धारा में सीखने की प्रक्रिया के साथ समन्वित हों। मैं एक ऐसे भारत की उम्मीद करता हूं जहां कोई भी पीछे न रह जाए, समृद्ध मानसिक स्वास्थ्य तक समान पहुंच हो। इसलिए हमें स्वस्थ और समृद्ध जीवन-यापन के लिए एक-दूसरे तथा अन्य व्यक्तियों के साथ सोचना, व्यक्त करना और बातचीत करना चाहिए।