आइये ‘श्रेष्ठ भारत’ के लिए एक हो



एकता में शक्ति है! यह शायद सबसे पहला पाठ है जो मैंने स्कूल के आरंभिक दिनों में सीख लिया था। मुझे अच्छी तरह से याद है कि हमारे "मास्साब" (शिक्षक) ने मुझे अपने स्कूल के दिनों में एकता का मूल्य सिखा दिया था। हमारा विद्यालय उत्तराखण्ड के गढ़वाल क्षेत्र (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में प्राचीन हिमालय पर्वत श्रृंखला के बीच था। उन्होंने हमें पेड़ की एक पतली डंडी दी और मेरे सभी दोस्तों और मुझे उसे तोड़ने के लिए कहा और हम सभी ने इसे बहुत आराम से कर लिया। अबकि बार उन्होंने बहुत सारे डंडियों को एक रस्सी से बांधकर हम सबके सामने रख दिया और अब इसे तोड़ने को कहा। हम सब ने एक के बाद एक करके उस बंडल को तोड़ने की कोशिश की परंतु तोड़ नहीं पाए। उस व्यावहारिक प्रदर्शन ने मेरे मन में एक स्थाई जगह बना ली। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के "शिक्षा मंत्रालय" की मेरी यात्रा में वास्तविक शिक्षा कि यह मेरी पहली सीख थी।निस्संदेह महान शिक्षक विद्यार्थियों के मन में एक स्थायी छाप छोड़ते है। एकता तथा एकजुटता के बारे में मेरे शिक्षक द्वारा जोड़े गए ये गुण मेरे व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक जीवन के अभिन्न अंग हैं। शिक्षक वास्तव में राष्ट्र के पोषणकर्ता हैं।

विश्वविख्यात तक्षशिला विश्वविद्यालय के ऐसे ही एक महान शिक्षक आचार्य चाणक्य, जिनके अनुसार शिक्षक साधारण नहीं होते, शिक्षक ही निर्माण या विध्वंश का निर्णय लेते हैं, ने भी एकता पर काफी जोर दिया। चाणक्य एक महान रणनीतिज्ञ थे; उनके जीवन का उद्देश्य उपमहाद्वीप को एक अखंड भारत के रूप में संगठित करना था। उन्होंने उपमहाद्वीप के विभिन्न राज्यों को जोड़ने का महत्व समझा और उपमहाद्वीप के पूरे भूगोल को एक राज्य व्यवस्था में बांधने का पवित्र संकल्प लिया। अपने महाकाव्य 'अर्थशास्त्र' में वे इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि एकात्मकता के बिना हमेशा के लिए बने रहना संभव नहीं है। उन्होंने हमें सिखाया है कि 'एकता' समृद्धि की पहली शर्त है।

मध्यकालीन युग में हमने देखा है कि किस प्रकार शासकों के बीच एकता के अभाव ने हमें विदेशी शासन के अधीन बना दिया। 1947 में चाणक्य के विचार फिर से इस महान धरती के यशस्वी पुत्र वल्लभभाई पटेल के रूप में वापस आये जो एक अत्यंत यथार्थवादी तथा व्यावहारिक नेता थे। उन्होंने जमीनी हकीकत को समझा और रियासतों को आधुनिक राष्ट्र के रूप में जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य अपने हाथ में लिया। वास्तव में भारत के ये लौहपुरुष सरदार पटेल "एक भारत" के असली वास्तुकार थे।

वर्ष 2014 में, हमारे प्रिय प्रधानमंत्री के एकजुट नेतृत्व में राजग के सत्ता में आने के बाद, भारत सरकार ने वल्लभाई पटेल के जन्मदिन को 'राष्ट्रीय एकता दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया ताकि उनके अविस्मरणीय योगदान, उनकी सेवा को उचित सम्मान दिया जा सके। आज जब हम राष्ट्रीय एकता दिवस को मनाते हैं तो मैं उनके दृढ़ संकल्प, समर्पण, राजनीति और अदम्य इच्छाशक्ति के साथ भारत को एक करने के प्रयासों के लिए सरदार पटेल को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

हमें एकता के निर्माण के बारे में उनके व्यक्तिगत और व्यावहारिक प्रयासों पर भी विचार करना चाहिए। युवा पटेल साहब कानून का अध्ययन करने के लिए स्वयं इंग्लैंड जाना चाहते थे, लेकिन वे अपने बड़े भाई विट्ठल भाई के पक्ष में खड़े रहे तथा उन्हें इंग्लैंड भेजने के लिए अपने पास रखे हुए पैसों को भी खर्च कर दिया। उन्होंने यह सब परिवार की एकता और सम्मान को बनाए रखने के लिए किया। यह दर्शाता है कि सरदार पटेल के व्यक्तित्व में एकता और एकजुटता के मूल्य कितने गहरे तक जड़े हुए थे। उसने हमें दिखाया कि एकता एकजुटता की पहचान है।

गोधरा अदालत के एक वकील से लेकर दुनिया के सबसे बड़े और सबसे युवा लोकतंत्र के नेता तक की अपनी यात्रा में सरदार पटेल ने एकता को सबसे प्रिय तथा सबसे ज्यादा महत्व दिया। उन्होंने खेड़ा और बारदोली में किसानों के हितों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ एकीकृत किया। किसानों की भूमि, संपत्ति तथा आजीविका के साधन जब्त किए जाने के बावजूद भी 1918 का खेड़ा सत्याग्रह किसानों की एकता और अनुशासन का प्रतीक है, साथ ही यह उस समर्थन का भी संकेत है जो वल्लभाई के नेतृत्व और विचारों को किसानों से मिला था। एकजुट और सुसंगत प्रयासों के कारण अंग्रेजों को तत्कालीन कर व्यवस्था में संशोधन करना पड़ा और जब्त भूमि को उनके मालिकों को लौटाना पड़ा। यह हमें एक और संकेत देता है कि एकता न्याय के साथ चलती है।

इसी क्रम में दस साल बाद पटेल ने एक बार फिर दिखाया कि एकता ही शक्ति है। सन् 1928 के बारदोली सत्याग्रह में उन्होंने सभी किसानों, भूमिमलिकों और मजदूरों को यह बात एकदम स्पष्ट कर दी कि यदि वे अपने उद्देश्य के लिए एकजुट रहने का वायदा करें, तभी वे उनका नेतृत्व करेंगे।उन्होंने उनसे कहा कि उन्हें विदेशी शासन के साथ सहयोग न करने के गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। इस दौर में भी इस करिश्माई, दृढ़ तथा व्यापक सोच वाले नेता को महिलाओं सहित सभी असंतुष्ट लोगों का मजबूत समर्थन व आश्वासन प्राप्त हुआ। इस सत्याग्रह की वजह से लोगों की जब्त संपत्ति वापस प्राप्त हो गई तथा सम्मिलित प्रयासों के चलते राजस्व वृद्धि के फैसले को भी वापस लेना पड़ा। बारदोली सत्याग्रह में ही बारदोली की स्त्रियों ने उन्हें सरदार की उपाधि से विभूषित किया।

इस तथ्य से हम सब भलीभांति परिचित हैं कि स्वतंत्रता के तुरंत बाद, हमारे देश को 560 रियासतों में विभाजित किया गया था, जो ब्रिटिश संप्रभुता से मुक्त हुए थे; वहां भारी अराजकता, भ्रम और असंयम का माहौल था। महान नेता चुनौतियों के दौरान ही महान चरित्र को दिखाता है और उस समय हमें पटेल साहब का भी ऐसा ही महान चरित्र दिखाई पड़ता है। वे इस अवसर पर अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ उभरकर सामने आते हैं और विश्व इतिहास के सबसे उल्लेखनीय एकीकरण के कार्य को अंजाम देते हैं। उन्होंने भारत के सभी बड़े और छोटे रियासतों को एकजुट किया।सरदार पटेल के इस प्रयास की सबसे उल्लेखनीय भूमिका भूगोल, भाषाओं, संस्कृतियों तथा परंपराओं के संदर्भ में ऐसे विविधता से युक्त देश को जोड़ने की उनकी समझ और योग्यता थी। उन्होंने समझ लिया था कि एकता पूर्णता का एक मार्ग है।

भारत सरकार, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरदार पटेल की विरासत को उचित सम्मान, परिश्रम और गौरव के साथ उजागर कर रही है। प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि एकता ताकत, क्षमता, प्रगति और सशक्तीकरण है। उनके नेतृत्व में विभिन्न मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय के नेतृत्व में एक भारत श्रेष्ट भारत पहल के अंतर्गत युग्मित राज्यों के लिए विनिमय कार्यक्रम, युवा उत्सव तथा भाषा सीखने जैसे कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री के पास इस एकीकरण को अगले स्तर तक पहुंचाने का अनन्य उत्साह, विश्वास और दृढ़ता है।

हमारे प्रधानमंत्री ने सभी भारतवासियों के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक एकीकरण का संकल्प लिया है। ‘प्रधानमंत्री जनधन योजना’ तथा ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के विचारों से लेकर ‘आत्मनिर्भर भारत’ के आवाहन तक, उनका नेतृत्व सरदार पटेल द्वारा दिए गए 'एक भारत' को 'श्रेष्ठ भारत' में बदलने का एक विराट सामर्थ्य एवं प्रतिबद्धता प्रस्तुत करता है। आइए हम सब एक साथ एकजुट हो जाएं।