भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए नेल्सन मंडेला के विचारों की प्रासंगिकता

मदीबा का यह स्‍पष्‍ट मानना था कि शिक्षा सशक्तिकरण और व्‍यापक बदलावों का एक अहम साधन है। हालांकि, इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए शिक्षा को प्रासंगिक बनाने की नितांत आवश्यकता है। शिक्षा से संबंधित उनके प्रसिद्ध उद्धरणों में से एक यह है-  "शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं।" 

18 जुलाई को पूरी दुनिया में ‘अंतर्राष्ट्रीय नेल्सन मंडेला दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने उन्‍हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, ‘अतिप्रिय मदीबा के उत्‍कृष्‍ट कार्य, आदर्श और सिद्धांत हमें निरंतर प्रेरित करते रहते हैं। उन्होंने शांति, समानता और सेवा भाव की जीत को सही मायनों में अभिव्‍यक्‍त किया।’ आज इस स्तंभ के माध्यम से मैं शिक्षा के क्षेत्र में उनके अनमोल विचारों और राय को साझा कर रहा हूं। इसके तहत उनके अनमोल विचारों को भारतीय शिक्षा प्रणाली के गुणात्मक विकास की व्‍यापक गुंजाइश और संभावनाओं से जोड़ने का प्रयास किया गया है।


मंडेला ने अपनी आत्मकथा ‘लॉन्‍ग वॉक टू फ्रीडम’ में बताया है कि किस तरह से शिक्षा ने उनके जीवन के विभिन्न दौर को सकारात्‍मक रूप से प्रभावित किया। जेल में रहने के बावजूदउन्होंने पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से अपनी कानूनी शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा के विषय में मंडेला काअत्‍यंत महत्वपूर्ण प्रश्न सदैव ‘शिक्षा के उद्देश्य’ से संबंधित होता था। उनकी राय यह थी कि शिक्षा बड़ी अनमोल है क्‍योंकि इससे कई उद्देश्यों की पूर्ति होती है।


व्यक्तिगत विकास के साधन के साथ-साथ अवसर की समानता के एक उपयुक्‍त वाहकया साधन के रूप में शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए उन्होंने यह राय व्‍यक्‍त की थी: ‘शिक्षा व्यक्तिगत विकास का सर्वोत्‍तम इंजन है। यह शिक्षा ही है जिसके माध्‍यम से किसान की बेटी डॉक्टर बन सकती है, खदान कर्मचारी का बेटा खदान का प्रमुख बन सकता है, खेतिहर मजदूर का बेटा एक महान राष्ट्र का राष्‍ट्रपति बन सकता है।’ इस प्रकार उनका यह स्‍पष्‍ट मानना था कि शिक्षा में किसी भी व्यक्ति को ‘सामाजिक, आर्थिक और दार्शनिक रूप से’बंधनों से मुक्त करने की अपार क्षमता है।


मदीबा की यह स्‍पष्‍ट राय थी कि शिक्षा केवल औपचारिक संस्थानों तक ही सीमित नहीं है। उनके ही शब्दों में: ‘‘संकीर्ण सोच वाले व्यक्ति को यह समझाना कठिन है कि‘शिक्षित’ होने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्‍यक्ति साक्षर हो और उसके पास बीए की डिग्री हो। सच तो यह है कि एक अनपढ़ आदमी ऊंची डिग्री पाने वाले किसी व्यक्ति की तुलना में कहीं अधिक ‘शिक्षित’ मतदाता हो सकता है।’’ उनके उत्‍कृष्‍ट विचार भारत की नई शिक्षा नीति के मसौदे में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। इस नीति में किसी व्‍यक्ति को अपने कार्य-क्षेत्र (फील्‍ड) में विशेषज्ञों से प्राप्‍त विशिष्‍ट ज्ञान के मूल्य के साथ-साथ कौशल को भी सहज रूप से मान्‍यता दी गई है, भले ही उसके पास कोई प्रोफेशनल डिग्री न हो। नीति में यह बात रेखांकित की गई है कि विभिन्न क्षेत्रों के स्थानीय विशेषज्ञों या जानकारों जैसे कि बढ़ई, राजमिस्त्री, इत्‍यादि को कौशल शिक्षा प्रदान करने के लिए स्कूलों में औपचारिक रूप से बुलाया जाएगा। यही नहीं, इससे भी कई और कदम आगे बढ़ते हुए नीति में यह भी कहा गया है कि उच्च प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों की स्थानीय शिल्पकारों और विभिन्‍न क्षेत्रों के विशेषज्ञों या जानकारों के साथ दस-दिवसीय इंटर्नशिप होगी। इसका उद्देश्य न केवल इन विशेषज्ञों या जानकारों से उनके विशिष्‍ट कौशल या ज्ञान को सीखना है, बल्कि समाज की प्रगति और विकास में इन स्वयं-निपुण विशेषज्ञों और कुशल व्यक्तियों के बहुमूल्‍य योगदान से विद्यार्थियों को अवगत कराना भी है।


मदीबा का यह स्‍पष्‍ट मानना था कि शिक्षा सशक्तिकरण और व्‍यापक बदलावों का एक अहम साधन है। हालांकि, इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए शिक्षा को प्रासंगिक बनाने की नितांत आवश्यकता है। शिक्षा से संबंधित उनके प्रसिद्ध उद्धरणों में से एक यह है-  ‘शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं।’  शिक्षा को पूर्वाग्रह के दुश्मन के रूप में भी देखा जाता था। इसे ध्‍यान में रखते हुए मंडेला ने कहा, ‘शिक्षा की ताकत उन कौशलों के विकास से भी काफी परे है जो हमें आर्थिक कामयाबी के लिए चाहिए। यह राष्ट्र निर्माण और सामंजस्य स्‍थापित करने में भी अहम योगदान दे सकती है।’ नेल्‍सन मंडेला के अनमोल विचारों को प्रतिबिंबित करते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय एक ऐसी नीति लेकर आ रहा है जिसमें इस बात की परिकल्पना की गई है कि हमारे संस्थानों का पाठ्यक्रम और अध्यापननिश्चित तौर पर विद्यार्थियों में मौलिक कर्तव्यों एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान की भावना, अपने देश के साथ जुड़ाव, औरबदलती दुनिया में अपनी भूमिकाओं एवं जिम्मेदारियों के प्रति जागरूकता विकसित करेगा।


आधुनिक शिक्षा की राह पर आगे बढ़ते हुए हमें अपने सांस्कृतिक इतिहास को कभी नहीं भूलना चाहिए। मंडेला ने कहा था कि इंसान को अपने सांस्कृतिक इतिहास को जानने और समझने की जरूरत है, जैसे कि संगीत, कला, नृत्य और स्थानीय भाषा। उन्होंने माना था कि अपने निजी जीवन में उन्होंने सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से अपने देश और वहां के लोगों के बारे में बहुत कुछ सीखा। भारत का सदियों पुराना एक समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास है। हमारा मंत्रालय एक नई शिक्षा नीति लेकर आ रहा है। इस नीति का सपना, सीखने वालों में भारतीय होने का गहरा गौरव भरना है, केवल विचार के स्तर पर ही नहीं बल्कि मूल भावना, बुद्धि और कर्मों के स्तर पर भी। साथ ही उनमें ऐसे ज्ञान, कौशल, मूल्यों और रुचियों को विकसित करना है जो मानवाधिकारों, सतत विकास, जीवन और वैश्विक भलाई के लिए जिम्मेदारी भरी प्रतिबद्धता को समर्थन करते हों जिससे सच्चे अर्थों में उनमें एक वैश्विक नागरिक प्रतिबिंबित हो सके।


मंडेला ने हमेशा अनुशासन, कड़ी मेहनत और शारीरिक तंदुरुस्ती पर जोर दिया और उन्होंने बड़ी ईमानदारी से अपने खुद के जीवन में इन चीजों का अभ्यास किया। उन्होंने कहा: “मैंने पाया है कि जब मैं अच्छी शारीरिक स्थिति में था तब मैंने बेहतर काम किया और अधिक स्पष्ट रूप से सोच सका। और इसलिए कसरत मेरे जीवन के दृढ़ विषयों में से एक बन गई”। जब वे छिपकर रहा करते थे उन अवधियों के दौरान भी उसी जगह पर जॉगिंग के लिए समय निकाल लेते थे। व्यायाम और शारीरिक तंदुरुस्ती न केवल निजी जीवन में उनके लिए महत्वपूर्ण थे, बल्कि वे उनके शैक्षिक दर्शन का भी एक अनिवार्य हिस्सा बन गए। जब भारत सरकार ने नागरिकों के दैनिक जीवन में शारीरिक गतिविधि / खेल को बढ़ाने के लिए 29 अगस्त 2019 को ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ की शुरुआत की तो उसने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण को एक ही निरंतरता की तरह लेने की सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति को दोहराया, जैसा कि मंडेला ने किया था। पूरे देश में “13 लाख” स्कूलों और “11 करोड़” छात्रों ने फिटनेस का संकल्प लिया। नई शिक्षा नीति में शारीरिक शिक्षा और कौशल शिक्षा को शैक्षणिक पाठ्यक्रम (पाठ्येतर या सह-पाठ्यचर्या गतिविधि के रूप में नहीं) के अभिन्न अंग के रूप में बरतने को लेकर दृढ़ प्रतिबद्धता के जरिए सरकार इन क्षेत्रों की ओर ध्यान वापस लाएगी ताकि हर बच्चे के समग्र विकास को सुनिश्चित किया जा सके।


कंप्यूटर साक्षरता पर मदीबा के विचारों को देखना बहुत प्रसन्न करने वाला है। वास्तव में वे विचार काफी आधुनिक थे। मंडेला ने शिक्षकों से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि ग्रेड 1 से ही शिक्षार्थी कंप्यूटर में साक्षर हों। इस प्रकार वे चाहते थे कि आज के शिक्षार्थी समकालीन तकनीकी विकास के साथ तालमेल रखें। आज की दुनिया में उनके विचार और भी ज्यादा प्रासंगिक तब हो गए हैं जब ज्यादातर शिक्षा मिश्रित ई-लर्निंग की ओर बढ़ रही है। भारत सरकार ने प्रधानमंत्री ई-विद्या को शुरू किया है ताकि दीक्षा (एक राष्ट्र-एक डिजिटल प्लेटफॉर्म), टीवी (एक कक्षा-एक चैनल), स्वयम, सामुदायिक रेडियो और सीबीएसई शिक्षा वाणी पॉडकास्ट और दिव्यांग बच्चों के लिए अध्ययन सामग्री आदि के माध्यम से शिक्षा तक एक बहु-मोडल पहुंच प्रदान की जा सके। ये सब सार्वजनिक दायरे में गुणवत्ता भरी ई-सामग्री की उपलब्धता का युग लेकर आएंगे और इस प्रकार प्रौद्योगिकी, शिक्षा में समानता का अग्रदूत बन जाएगी।

नेल्सन मंडेला के विज़न में शिक्षा के लिए एक परिवर्तनकारी शक्ति है। भारत में शिक्षा का रास्ता उपलब्धता, समानता, गुणवत्ता, सामर्थ्य और जवाबदेही के आधारभूत स्तंभों पर स्थापित है जैसा कि हमारी नई शिक्षा नीति में उल्लेखित है और यही सब मंडेला के दिल के बहुत करीब थे। यकीनन हम उनसे प्रेरणा लेते हैं क्योंकि हम प्रत्येक शिक्षार्थी की रचनात्मक क्षमता का दोहन करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसके साथ ही वे “सामाजिक, आर्थिक और दार्शनिक” रूप से स्वतंत्र बन सकें इसके लिए उन्हें सशक्त बनाने को भी हम प्रतिबद्ध हैं ताकि भारत को वैश्विक ज्ञान के केंद्र में बदलने के लिए समानता के दृष्टिकोण से वे योगदान कर सकें।