भविष्य के भारत के प्रकाश स्तंभ: पंडित दीनदयाल उपाध्याय


अनादिकाल से चली आ रही भारतीय लोक कल्याण की चिंतन परंपरा पूरे विश्व के लिए एक मार्गदर्शक है। इसी भारतीय चिंतन परंपरा के वाहक, सदी के महापुरुष व् राष्ट्रवादी सोच के पोषक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने कर्तव्य बोध, व्यक्तित्व और विचारों से देश का मार्गदर्शन किया है। जब देश नई शिक्षा नीति के साथ ज्ञान-परम्परा के नाए आयाम में प्रवेश कर रहा है, ऐसे में पंडित जी जैसे महान चिंतक, समाजसेवी, ओजस्वी वक्ता, प्रखर लेखक और कुशल राजनीतिज्ञ की प्रासंगिकता ओर बढ़ जाती है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी राजनीति में शुचिता, शिक्षा में भारतीयता ओर व्यवहार में सादगी उन्हें विशिष्टता प्रदान करती है।


भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी, पंडित जी की कार्यक्षमता, संगठन कौशल एवं वैचारिक गहराई से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने कानपुर अधिवेशन में कहा था “यदि मुझे दो दीन दयाल मिल जाएँ तो मैं भारतीय राजनीति का नक्शा बदल दूँ।" पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने अपनी विलक्षण कार्यशैली ओर संगठन शक्ति से जनसंघ को भारतीय राजनीति में एक प्रमुख ताकत के रूप में स्थापित किया। इसी नीति और नियत के धरातल पर आज भारतीय जनता पार्टी एक मज़बूत एवं प्रभावशाली संगठन के तौर पर दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल बन चुकी है ओर देश को कुशल राजनैतिक नेतृत्त्व प्रदान कर रही है। पंडित जी का मानना था “राष्ट्रीयता की संस्कृतिवादी अवधारणा ही जनसंघ की मौलिक अवधारणा है। संस्कृति की आधारशिला पर ही हमारा आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक चिंतन खड़ा है। संस्कृति की यह अवधारणा भारतीयतावादी है।


इसी भारतीयतावादी के विचार को आगे चलकर पंडित जी ने “एकात्म मानववाद” के रूप में प्रस्तुत किया। जानना जरुरी है कि उपाध्याय जी के "एकात्म मानववाद" की पृष्ठभूमि के दो प्रमुख आयाम हैं - एक, पाश्चात्य जीवन दर्शन और दूसरा, भारतीय संस्कृति। ‘मानववाद’ मुख्यतः पाश्चात्य अवधारणा है तथा ‘एकात्मता’ भारतीय। अतः कहा जा सकता है कि एकात्म मानववाद, पाश्चात्य मानववाद के भारतीय जीवन दर्शन के साथ भारतीयकरण की फलश्रुति ही है। उपाध्याय जी एक नीतिवान राजनीतिक चिंतक हैं। दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन शाश्वत विचारधारा से जुड़ता है। इसके आधार पर वह राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हैं , समझने का प्रयास करते हैं। समस्याओं पर विचार करते हैं व उनका समाधान निकालते हैं। एकात्म मानव, अन्त्योदय जैसे विचार हमारी ऐतिहासिक धरोहर का ही एक मूर्तरूप है। यह ऐसा दर्शन है जो हमारी ऋषि परंपरा से जुड़ता है। इसके केंद्र में व्यक्ति विशेष या राजनीतिक सत्ता नहीं है। इसी सोच के साथ हम वैश्विक नागरिक के निर्माण की परिकल्पना को भी गढते हैं। दीनदयाल जी के चिंतन को मुख्यतः ‘अंत्योदय’ के रूप में याद किया जाता है। यद्यपि इस शब्द का प्रयोग विनोबा भावे ने भी किया है। यह विचार के साथ साथ क्रियान्वयन की एक पद्धति है। निर्धन और वंचितों के आर्थिक विकास एवं उत्थान का उनका तरीका ‘अंत्योदय’ है। दीनदयाल जी का अंत्योदय विचार आज भी प्रासंगिक है। भारत में अनेकवाद अपनाये गये। अब तो वैश्विकरण और उदारीकरण को भी लंबा समय हो गया। लेकिन अमीर व गरीब के बीच की खाई व्यक्तिवादी व उपभोगवादी चिंतन का भी परिणाम है। विकास हुआ, मगर असंतुलित है। सत्ता व समाज दोनों को जिम्मेदारी से काम करने की दीनदयाल उपाध्याय प्रेरणा देते हैं। उनकी सोच समाज के सबसे निचले पायदान पर जो व्यक्ति है, उसके उत्थान का प्रयास प्राथमिकता से होनी चाहिये।


पंडित दीन दयाल उपाध्याय धर्म एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था के पक्षधर और प्रजातंत्र की अवधारणा को मन से स्वीकार करते हुए इसे सभ्य समाज के लिए सर्वोत्तम प्रणाली मानते हैं। किन्तु वे इस विचार से बिलकुल सहमत नहीं हैं की प्रजातंत्र भारत को पश्चिम की देन है। हमारे यहाँ वैदिक काल में “वैदिक सभा” समिति तथा जनपदों में नागरिकों को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता के साथ लोक कल्याण के लिए समान अवसर उपलब्ध थे। भारत की राज्यावधारणा प्रकृति लोकतंत्रवादी है। पंडित जी कहा करते थे “मैं राजनीति का नहीं संस्कृति का राजदूत हूँ।" पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था “राजनीति उपाध्याय जी के लिए साधन थी, साध्य नहीं। यह मार्ग था, मंजिल नहीं। वे राजनीति का आध्यात्मीकरण चाहते थे। वे भारत के उज्जवल अतीत से प्रेरणा लेते थे, तथा उज्जवलतर भविष्य का निर्माण करना चाहते थे। उनकी आस्थाएं सदियों पुराने अक्षय राष्ट्र जीवन की जड़ों से रस ग्रहण करती थीं, किन्तु वह रूढ़िवादी नहीं थे। भविष्य के निर्माण के लिए वे भारत को समृद्धशाली आधुनिक राष्ट्र बनाने की कल्पना लेकर चले थे।"


भारतीय विचारों, संस्कृति ओर ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए श्री दीन दयाल उपाध्याय जी के सतत प्रयासों एवं बौद्धिक प्रयोगों के परिणाम स्वरुप 1945 में मासिक पत्रिका "राष्ट्र धर्म" ओर साप्ताहिक “पाँचजन्य” का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। ये दोनों प्रकाशन आज भी भारतीयता की अलख जगा रहे हैं इसी श्रंखला में "स्वदेश" नामक दैनिक भी उन्हीं के संरक्षण में प्रारंभ हुआ, जिसके कई शहरों से निकलने वाले संस्करण आज भी लोकप्रिय हैं।


पंडित जी एक राष्ट्रवादी चिंतक थे। राजनीति उनके लिए एक राष्ट्रीय अखंडता का साधन है। उनके अनुसार “राष्ट्रीय एकात्मता एक बहुमूल्य सिद्धांत है। राजनीति की बेदी पर उसकी बलि कदापि नहीं चढ़ाई जानी चाहिए।" व्यक्ति की राष्ट्रीयता का मूल्यांकन केवल जाति-धर्म, मजहब के आधार पर नहीं करना चाहिये। उसकी राष्ट्रीयता का मूल्यांकन तो राष्ट्र धर्म के पालन से होता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी अखंड भारत के पक्षधर थे। महात्मा गांधी की तरह उनका अहिंसा में अटल विश्वास था ओर उनका स्पष्ट सन्देश था कि “भारत को अखंड करने का मार्ग युद्ध नहीं है, युद्ध से भौगोलिक एकता हो सकती है, राष्ट्रीय एकता नहीं”। अखंडता भौगोलिक ही नहीं राष्ट्रीय आदर्श भी है।"


जिस दौर में नारी उत्थान बहुत ही उपेक्षित सा विषय था, पंडित दीन दयाल उपाध्याय नारी सशक्तिकरण के समर्थक थे। उनकी राय में महिलाओं को पुरुषों की भांति समान अवसर देने से ही समाज की प्रगति संभव थी । उनका दृढ़ विश्वास था कि कोई भी समाज स्त्री की उपेक्षा करके राष्ट्र निर्माण नहीं कर सकता। यदि हम परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण विश्व का कल्याण चाहते हैं तो हमें नारी जाति के प्रति सम्मान, विश्वास और आदर रखना होगा। स्त्री के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वाभिमान और सुरक्षा के लिए विशेष प्रयत्न करने होंगे। इसी सोच का परिणाम है कि आज भारतीय जनता पार्टी संगठन में महिलाओं की सक्रियता, सम्मान व् योगदान अनुकरणीय है।


हर देशवासी को समान ओर स्तरीय शिक्षा मिले, इसकी चिंता पंडित जी के विचारों में कई जगह झलकती है| समाज में शिक्षा के स्थान की प्राथमिकता और गरिमा का बोध कराते हुए दीन दयाल जी कहते हैं, “हमारे शास्त्रकारों के अनुसार यह ऋषि ऋण है जिसे चुकाना प्रत्येक का कर्तव्य है। जब हम भावी संतति की शिक्षा की व्यवस्था करते हैं, तो हमारी उनके प्रति उपकार की भावना नहीं रहती अपितु हमें जो कुछ धरोहर अपने पूर्वजों से प्राप्त हुयी है, उसे आगे की पीढ़ी को सौंपकर उनके ऋण से उऋण होने की मनीषा रहती है”। हम भूत के ऋण से उऋण हो सकते हैं, यदि भविष्य को अपना ऋणी बनायें। शिक्षा दान भी समाजसेवा का एक माध्यम है। पंडित जी की मान्यता है कि “शिक्षा के व्यापक अर्थों में समाज का प्रत्येक घटक शिक्षक है। अतः प्रथम शिक्षक है समाज, द्वितीय - अध्यापक व् तृतीय है व्यक्ति स्वयं।” इस शिक्षक त्रयी को शास्त्रकारों ने इन वाक्यों में प्रतिबिंबित किया है।

माता प्रथम गुरु;

आचार्य देवो भव

आत्मदीपो भव

इन तीनों शिक्षकों के शिक्षा देने के अलग-अलग माध्यम हैं। प्रथम संस्कार, द्वितीय अध्ययन व् तृतीय स्वाध्याय।


भाषा को लेकर भी उनकी अपनी अलग सोच थी। उनका मानना था कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। वह स्वयं में एक अभिव्यक्ति है। भाषा के एक-एक शब्द, वाक्य रचना, मुहावरे आदि के पीछे समाज जीवन की अनुभूतियाँ, राष्ट्र की घटनाओं का इतिहास छिपा हुआ है। भारतीय भाषाओँ से ही हमारे युवक संस्कारित हो सकते हैं। संस्कारसक्षम समाज अर्थात व्यक्ति-व्यक्ति में शिक्षा के विषय में उत्तरदायित्त्व की भावना आवश्यक है। परिवार, हाट-बाजार, खेत-खलिहान ये सब शिक्षालय ही हैं। ‘शिक्षा’ से प्राप्त सामर्थ्य समाज को सदैव सही रास्ता खोजने के लिए सिद्ध करता है।


पंडित जी कहा करते थे “हम दुनिया के श्रेष्ठ विचारों को लेने में कोई संकोच नहीं करते, परन्तु अपनी मूलयवान धरोहर खोकर नहीं।” आज भारत की विकास गाथा का मूल मन्त्र है - "वैश्विक रूप से सोचना ओर स्थानीय स्तर पर कार्य करना।" नई शिक्षा नीति के साथ भारत अब वैश्विक ज्ञान गुरु के पथ पर अग्रसर है, ऐसे में सही नीति, सटीक मार्ग ओर सक्षम संसाधन के लिए पंडित जी का व्यक्तित्व और कृतित्व देश ही नहीं विश्व के लिए मार्गदर्शक है।