सुशासन दिवस


एक अवधारणा के रूप में 'सुशासन' की वैश्विक मान्यता नब्बे के दशक से उभरी। हालांकि यह अवधारणा भारत के लिए कभी नई नहीं रही। हमारे सदियों पुराने शास्त्रों और अतीत के महान दूरदर्शियों ने, हमेशा सुशासन के प्रतीक के रूप में भारत की कल्पना की है। भगवद्गीता में सुशासन, नेतृत्व, कर्तव्यबोध और आत्मबोध के बहुत सारे संदर्भ हैं जिनका आधुनिक भारत के संदर्भ में पुनरव्याख्या भी की गई है। अपने प्राचीन भारतीय राजनीतिक ग्रंथ- ‘अर्थशास्त्र’ में, कौटल्य ने इस बात को रेखांकित करते हुए कहा है कि लोगों का कल्याण राजा का सर्वोपरि कर्तव्य था। यहां तक कि महात्मा गांधी जी के 'सु-राज' का निहितार्थ भी निश्चित रूप से सुशासन ही था। इस तरह के ज्ञान से प्रेरित होकर, हम अपने लोकतांत्रिक संस्थानों और एक जीवंत अर्थव्यवस्था के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने में सक्षम हुए हैं।


भारत में सुशासन की आधुनिक धारणा को दूरदर्शी नेता और हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा पोषित किया गया है, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लोगों की भलाई के लिए समर्पित कर दिया। उनका कथन “सत्य का संघर्ष सत्ता से - न्याय लड़ता निरंकुशता से” (Truth brawls the power whereas justice brawls the autocracy) उनके सम्पूर्ण जीवनकाल में उत्कृष्ट लोकतंत्र का आदर्श वाक्य रहा है। उन्होंने सम्पूर्ण विश्व के समक्ष सुशासन के महत्व का प्रदर्शन किया था - जो लोगों के कल्याण के लिए सभी बाधाओं के खिलाफ लड़ने के लिए सच्चाई, शक्ति और साहस के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। वाजपेयी जी का दृढ़ विश्वास था कि राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए सबसे पहले अपने नागरिकों को सशक्त बनाना जरूरी है और इस संबंध में उन्होंने भारत में शिक्षा परिदृश्य को विकसित करने के अपने प्रयासों को चैनलाइज किया।


शिक्षा क्षेत्र में सुधार, उनका गंभीर संकल्प था और इसी क्रम में सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत 20 नवंबर को प्राथमिक(Primary) और प्रारंभिक(Elementary)शिक्षा परियोजनाओं पर समर्थन और विकास के लिए की गई थी। इसका उद्देश्य वर्ष 2007 तक 6-14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए पांच वर्ष की प्राथमिक शिक्षा और वर्ष 2010 तक आठ वर्ष की स्कूली शिक्षा सुनिश्चित करना था। सर्व शिक्षा अभियान का दृष्टिकोण सामुदायिक स्वामित्व और ग्राम शिक्षा योजनाओं पर केंद्रित है, जैसा कि पंचायती राज संस्थानों (पीआरआई) के परामर्श से प्रस्तावित है, जिन्हें जिला प्रारंभिक शिक्षा योजनाओं का आधार बनाया गया है।


शिक्षा के क्षेत्र में स्कूल से बाहर के सभी बच्चों की समावेशन पर विशेष ध्यान दिया गया। नियमित स्कूलों के बुनियादी ढांचे को सुधारने और मुख्यधारा के बच्चों के लिए रणनीति बनाने पर अतिरिक्त ध्यान दिया गया है, जिन्हें कई कारणों से स्कूलों की परिधि से बाहर छोड़ दिया गया है। इसके लागू होने के बाद से ही सर्व शिक्षा अभियान को शानदार सफलता मिली थी। इसके कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप, स्कूल से बाहर के बच्चों की संख्या 2001 में 320 लाख से घटकर 2005 में मात्र 95 लाख रह गई। 2005-06 के दौरान, सर्व शिक्षा अभियान ने स्कूलों के बेहतर बुनियादी ढांचे, नए स्कूलों और कक्षाओं को जोडऩे और शिक्षकों को जोडऩे के मामले में भी महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की।


वाजपेयी जी के प्रयासों को, भारतीय शिक्षा प्रणाली के इतिहास में, सार्वभौमिक माध्यमिक शिक्षा की दिशा में सबसे आवश्यक और सफल कदम माना गया है। सर्व-शिक्षा अभियान उपलब्धि ने, योजना के एक अग्रिम चरण और इनपुट-आधारित से परिणाम-आधारित केंद्रीय क्षेत्र के हस्तक्षेप के लिए, स्कूल शिक्षा के विकास के दृष्टिकोण में एक बदलाव का आह्वान किया है, जैसा कि नीति आयोग द्वारा 2017-18 से 2019-20 के तीन वर्षीय एजेंडे- ‘रिपोर्ट इंडिया’ में सिफ़ारिश की गई है। इस प्रकार, स्कूल शिक्षा पर एक एकीकृत योजना, सर्व शिक्षा अभियान को मोदी जी के सम्मानजनक नेतृत्व में औपचारिक रूप दिया गया जो स्कूल, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक से वरिष्ठ माध्यमिक स्तर तक एक सतत प्रक्रिया के रूप में 'स्कूल' प्रस्तुत करता है; इसमें सर्व शिक्षा अभियान की तीन पूर्व योजनाओं- राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (RMSA) और शिक्षक शिक्षा (TE) को शामिल किया गया है। समग्र शिक्षा अभियान, सभी के लिए गुणवत्ता-सुलभ और सस्ती शिक्षा के प्रावधान पर विचार करता है। ईसीसीई(ECCE) को सुदृढ़ करने के लिए कई प्रयास किए गए हैं, जैसे- शिक्षकों और प्रधानाचार्यों के सेवाकालीन प्रशिक्षण, अधिगम परिणामों में सुधार, उपलब्धि का संचालन, अनुकूल शिक्षण वातावरण का विकास, पुस्तकालय के लिए अनुदान, खेल और शारीरिक गतिविधियां, राष्ट्रीय आविष्कार अभियान के लिए सहायता, आईसीटी और डिजिटल पहल, स्कूल नेतृत्व विकास कार्यक्रम, उपचारात्मक शिक्षण, पढे भारत- बढ़े भारत, आदि।


यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि जब नागरिकों को सुशासन की गारंटी दी जाती है, तो वे अपने प्रयासों को पूरे सामर्थ्य और उम्मीदों के साथ आगे बढ़ा सकते हैं और अधिक से अधिक संभावनाओं के साथ राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में योगदान दे सकते हैं। शिक्षा क्षेत्र में सुधार भारत में सुशासन की रीढ़ रहे हैं। वाजपेयी जी की विरासत निश्चित रूप से हमारे नेताओं की भावी पीढ़ियों को प्रेरित करने वाली है, और मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के अद्भुत नेतृत्व में, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, उनकी विरासत को और भी अधिक ऊंचाइयों तक ले जाएगी। "सिटीजन-फर्स्ट" मेरा मार्गदर्शक सिद्धांत रहा है, और मैं हमेशा सरकार को हमारे नागरिकों के करीब लाने का प्रयास करूंगा ताकि वे शासन प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनें।