वैश्विक भाषा के रूप में कदम आगे बढाती हिंदी

समस्त हिंदी प्रेमियों के लिए 10 जनवरी का दिन बेहद खास होता है क्योंकि इस दिन विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाए जाने का उद्देश्य वैश्विक पटल पर हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करना तथा उसका प्रचार-प्रसार करना है।


आज भारतीय डायसपोरा पूरी दुनिया में फैला है। भारत के एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरने से दुनिया में भारत के प्रति आकर्षण बढ़ा है। भारतीय जहाँ भी गए अपनी भाषा और संस्कृति ले गए। मारिशस , फीजी, सूरीनाम, त्रिनिडाड एवं टोबैगो आदि देशों में तो ऐतिहासिक रूप से हिंदी का विशेष स्थान है ही अब यूरोप अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों में भी हिंदी जानने वालों की संख्या में तेजी से विस्तार हुआ है। विदेश में रह रहे हिंदी लेखकों ने हिंदी साहित्य को समृद्द करने में महत्वपूर्ण योगदान किया है। भारत, भारतीयता और हिंदी व भारत की भाषाओँ के प्रसार की रीढ़ आप्रवासी भारतीय हैं।


सांस्कृतिक भारत दुनिया के आकर्षण का केंद्र है। भारतीय गीत , संगीत, कला और फिल्में दुनिया मे बहुत लोकप्रिय है। हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता सरहदें नहीं जानती। रूस,सार्क देशों, मध्य एशिया के देशों में पचास के दशक से भारतीय फिल्में लोकप्रिय हैं। पश्चिम देशों, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, आदि देशों मे हिंदी फिल्मों का एक बड़ा मार्केट है। अफ्रीका के दूरदराज के देशों और प्रशांत देशों मे हिंदी फिल्में और कलाकारों को अपार लोकप्रियता प्राप्त है। भारत कला,मनोरंजन और संस्कृति के क्षेत्र में एक महाशक्ति है और यह हिंदी प्रसार के पीछे सबसे बड़ी शक्ति है।

वैश्विक स्तर पर हिंदी के महत्व को रेखांकित करने और हिंदी के विश्व में प्रचार – प्रसार के लिए व्यवस्थित प्रयास करने में विश्व हिंदी सम्मेलनों की बड़ी भूमिका रही है। हिंदी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के उद्देश्य से 1973 में विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा रखा गया था। इस प्रस्ताव की गंभीरता को समझते हुए ही प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन वर्ष 1975 में नागपुर में आयोजित किया गया। 1975 के बाद से लगातार विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी भाषा का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बनकर उभरा है और अब तक कुल 11 विश्व हिंदी सम्मेलन भारत के अलावा मॉरीशस, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, लंदन, सूरीनाम, न्यूयॉर्क (अमेरिका), जोहान्स्बर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में आयोजित हो चुके हैं। चूंकि 10 जनवरी को पहला विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया था अतः इस दिन को भारत सरकार ने वर्ष 2006 से विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाना घोषित किया है।


उल्लेखनीय है कि ग्यारहवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन18 से 20 अगस्त, 2018 को मॉरीशस में हुआयह पहली बार हुआ है कि सम्मेलन में केवल हिंदी भाषा ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी पूरी संस्कृति पर चर्चा हुई। साथ ही आयोजन स्थल पर बने सभागारों के नाम भी हिंदी साहित्यकारों के नाम पर रखे गए थे। यह हिंदी के प्रति आकर्षण और सम्मान का सूचक है। आज वस्तुस्थितियह है कि वे देश जहाँ आप्रवासी भारतीयों का एक बड़ा तबका उपस्थित है वहां हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। सम्पूर्ण विश्व में हिंदी के शिक्षण, शोध, प्रचार-प्रसार और सृजन में समन्वय के लिए अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग स्थापित हो रहे हैं। साथ ही हिंदी को सूचना एवं संचार तकनीक, मानकीकरण, विज्ञान व तकनीकी लेखन, कंप्यूटर तथा इंटरनेट से जुड़े सभी प्रकार के आधुनिक तकनीकों के अनुरूप विकसित किया जा रहा हैं।


इस दिशा में आगे बढ़ते हुए हमारी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी हिंदी भाषा एवं भारतीय भाषाओं के विकास पर जोर देती है। यह प्रारंभ से ही उनकी भाषायी नींव मजबूत करती है। इस नीति के माध्यम से भारतीय भाषाओं और तुलनात्मक साहित्य के सशक्त विभाग तथा कार्यक्रम पूरे देश में शुरू किए जाएंगे। बहुभाषावाद पर बल देते हुए नीति में एक भारतीय अनुवाद एवं निर्वाचन संस्थान भी स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इससे ज्ञान -विज्ञान के विविध क्षेत्रों में उपलब्ध जानकारी को हिंदी और भारतीय भाषाओँ में लाया जा सकेगा और हिंदी और भारतीय भाषओँ की विरासत को भी और मजबूती के साथ दुनिया में प्रस्तुत किया जा सकेगा।


आंकड़ों के माध्यम से देखें तो2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या की 96.71% आबादी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भारतीय भाषाओं में से किसी न किसी एक भाषा से अनिवार्यत: संबद्ध है और इस आबादी का 44% हिस्सा हिंदी भाषा को ही मुख्य भाषा के रूप में प्रयोग करता है। इसके अलावा एथनोलॉग (Ethnologue) की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक 63.7 करोड़ लोगों के साथ हिंदी, विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।


वैश्वीकरण तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार के इस दौर में हमारी हिंदी वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा बहुराष्ट्रीय मांगो को पूरा करने में पूर्णतः सक्षम है। आज हिंदी सही मायनों में न केवल भारतीय भाषाओं के साथ बल्कि विश्व की अन्य भाषाओं को भी अपनी समाहार शक्ति साथ लेकर चल रही है। हिंदी के मूर्धन्य कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था कि,‘हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है’। निश्चय ही हिंदी में वह वैज्ञानिकता तथा तकनीकी ताकत है जिसके माध्यम से यह पूरे वैश्विक ज्ञान परंपरा का निर्वहन कर सकती है।


इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी माता, मातृभूमि तथा मातृभाषा से प्राकृतिक रूप से प्रेम होता है लेकिन जब बात हिंदी की आती है, तब सभी भाषाएँ एक बिन्दु पर सिमट जाती हैं और उस केंद्र बिंदु पर निहित हिंदी का आकर्षण बल भारत से बाहर विस्तार लेता हुआ विश्व के हर कोने तक पहुँचता है। ऐसे में हिंदी को विश्व के मानस पटल पर स्थापित करने की जो मशाल हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा प्रदीप्त की गई, उस परंपरा को हमारे ओजस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा और भी देदीप्यमान तथा प्रज्वलित किया जा रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि बहुत ही जल्द हम हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने में भी सफल होंगे।